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Thursday, January 11, 2018
Monday, August 14, 2017
इस ब्लॉग में इससे पहले की जो पोस्ट लिखी है उसके पीछे एक कारण था. एक फोन आया था किसी शोधकर्ता का. वे तमिल साहित्य का हिंदी में अनुवाद से सम्बंधित विषय पर पी.एच,डी कर रहे थे. स्वाभाविक ही था अक्का का जिक्र आना. इंटरनेट पर उनके विषय में जानकारी खोजते हुये वे इस ब्लॉग तक पहुंचे , फिर मेल और फोन के जरिये एक दो बार बातचीत हुई. उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि हम अक्का के विषय में जानकारी संक्षेप में उन्हें प्रेषित कर दें, जिसके आधार पर वे अपने शोध ग्रंथ में आवश्यकतानुसार तथ्यें को शामिल कर सकें. हमने भी उनसे अनुरोध किया था कि ग्रंथ प्रकाशित हो जाने पर वे हमें उस पृष्ठ को जिसमें अक्का का जिक्र हो स्कैन कर मेल कर दें. उद्देश्य कुछ नहीं बस अच्छा लगता कि ताजा तारीखों तक उनकी लेखनी का जिक्र हो रहा है. किंतु या तो उनका ग्रंथ अभी तक प्रकाशित नहीं हुआ है या फिर किन्हीं अपरिहार्य कारणों से, व्यस्तताओं के चलते वे हमें वह पृष्ठ अभी तक प्रेषित नहीं कर पायें हैं. चलिये, इस नयी पोस्ट का उससे कोई सम्बंध नहीं है, वह तो बस पिछली पोस्ट पर नजर पड़ी तो वह संदर्भ ध्यान आ गया.
आज अक्का की एक कविता शेयर करने जा रहे हैं,---
देश सुलगता है
धीरे धीरे
और किसी दिन
सहसा धमाके के साथ
कोई ज्वालामुखी फूटता है
लावे की चपेट में
आ जाता है पूरा देश
तपता है देश
तपते हैं लोग
और धधकता है लोकतंत्र
फिर भी वे कहते हैं
और वे ही नहीं
सब कहते हैं
लोकतंत्र जीवित है
और इसे दोहराने को
वे भी विवश हैं
जिन्होने मौत को
अपने पास टहलते हुए देखा है
देखें हैं धू धू कर जलते रिश्ते
चीख पुकारों और नारों के बीच
लोकतंत्र को बचाए रखने की चिंता
समूचा देश चिता बन गया हो जैसे
चिता की लपटों की तरह
सरसराती अफवाहें
अफवाहें समूह में
बदल जाती हैं
समूह भीड़ में
और भीड़ आक्रोश में
और आक्रोश
सच नहीं जानता
वह जानता है सिर्फ हत्या
हत्या व्यक्ति, सिद्धांत की नहीं
देश की, आस्था की होती है
शासन चुपचाप देखता है
क्यों कि वह परे है
इन सारे प्रहारों से
उसे तो शब्द भी नहीं छूते
नारे और व्यथा कथाएं
भला कहां छू पाएंगे
वह तंत्र फिर फिर
पनपता है
बुलेटप्रूफ कारों, केबिनों में
कहीं कुछ मिटती है तो
सिर्फ आस्था
आस्था जीने की
आस्था आदमी की
आस्था देश या धर्म की
फिर कहीं कुछ नहीं उगता
बस धुंआ सा उठता है
एक धुंध में लिपटा देश
और इस धुंए का
कोई संबंध नहीं होता
किसी खंडित आस्था से
पर वह धुंआ फैलता है
धीरे बहुत धीरे
फसल मुरझाने लगती है
अगली पीढ़ी की
धुंआ खत्म नहीं होता
धरती बांझ होने लगती है
ढेरों दरारें छिटकने लगती हैं
मरघट से वीराने में
मुट्ठी भर लोग भी
नहीं रह जाते
कि राख हो चुकी
फसल से
फूल बीन सकें आस्था के.
हर काल - खंड में देश सुलगता है, कभी
किन्हीं कारणों से, कभी किन्हीं कारणों से और सच है हर बार घायल होती है हमारी आस्था, लड़खड़ा जाता है हमारा विश्वास.इस समय हम
अपने 71वें स्वतंत्रता दिवस की दहलीज पर हैं. कितना विषाक्त वातावरण है. अपने अपने संकुचित लाभ के लिए नेतागण देश का अस्तित्व ही खतरे में डालने पर
आमदा हैं. निहित स्वार्थों के चलते देश का
इतिहास, भूगोल बदलने में भी उन्हें कोई गुरेज नहीं है. इस सबके बीच पिस रहे हैं आम आदमी के सपने, घुट रही
हैं उसकी सांसें, धुंधला
रही है भविष्य की ओर तकती उसकी दृष्टि. पर हमारा यानि आम आदमी
का तो सारा दारोमदार ही अपने भीतर के विश्वास और आस्था पर है. खिसक तो रहा है वह भी मुट्ठी में से रेत सा, पर सब
कुछ राख हो जाने पर भी फिर फिर फूटेंगे ही नव अंकुर उसी ढेर से. नव
सृजन के लिए विनाश, बनने के लिए बिगड़ना
भी शायद आवश्यक सा ही प्रक्रिया है.
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