Monday, December 29, 2014

विरल राग

उदास हो चला था वह कमरा। अँधेरा जैसे दबे पांव चला आया था, उजाले को हौले से सरकाते हुए। वह चुपचाप बैठी रही, अलसाई सी। मन नहीं हुआ कि उठे और बत्ती  जला दे. सामने की मेज  पर शेखर का पत्र फड़फड़ा रहा था। बार बार फिसलते शब्द उस तक आते। वह जैसे उन्हें ठेल कर  लौटा देती। अँधेरे में हलकी सी फड़फड़ाहट सुनाई देती, उन अक्षरों की पहचान धुंधली हो गयी। उनके अर्थ उस तक पहुचते पंहुचते रास्ता भूलने लगे। वह चाहती थी अक्षर अँधेरे में कहीं खो जाय, ठीक उसी तरह ; खुद वह, उसका वजूद भी न रहे, न हो वे अक्षर, न ही उनके संप्रेषित अर्थ।
उसे अच्छा लगता है, यूं ही खुद भी अँधेरे का एक हिस्सा बन जाना और उसके साथ ही सहसा तमाम चीजे भी अँधेरे का हिस्सा बनती जाती हैं। एक सुरक्षित हिस्सा बन जाती है वह, एक थिगली भर।  न उसके लिए कोई प्रश्न होते हैं, न ही किसी उत्तर की जवाबदेही का दायित्व उसे ढोना पड़ता है।
उसने खिड़की से बाहर देखा, तेज हवा के झोंको ने बादलों की वह हल्की सी परत बुहार कर साफ कर दी थी, शायद चांदनी धुंए की तरह धीरे धीरे पसर रही थी। अक्टूबर के दिन थे। शहर  का धुंआ, यहां छतों पर नहीं मंडराता। इसीलिये चांदनी धुली और साफ़ लग रही थी। उसने खिड़की की सलांखो पर सर टिका कर बाहर देखने की कोशिश की। चुप पत्तों वाला सिर्फ एक पेड़। हवा सरसरा उठी थी। और हल्का सा झोंका अँधेरे में चला गया। पेड़ फुसफुसाने लगे। वह तमाम उदास निस्संगता जैसे ख़त्म हो गयी थी क्षणांश में। उसे अच्छा लगा कि उसकी निस्संगता ख़त्म हो गयी थी।
दिन के उजाले में वह कुछ और ही हो जाती थी। हर रिश्ते की एक मांग होती है और मांग के अनुरूप शिकायतें भी। कई बार उसे लगता है कि वह जो कहना चाहती है ,या जो कुछ भी करना चाहती है ,उसे उजाले में न कह सकती है ,न कर सकती है . अँधेरे में वह खो जाना चाहती है और ढूंढते रहना उसे अच्छा लगता है। रिश्तों की पीड़ा भी जैसे गुम हो जाती है। 
छोटी सी खिड़की से चांदनी के मायावी संसार को देखती रही।  यही तो करती थी वह। शाम हुयी नहीं कि बाग में जा कर बैठ जाती थी, या फिर छत पर चली जाती थी ,पढ़ने के बहाने। धीरे धीरे रंग बदलता आकाश। सिंदूरी ,लाल ,पीला ,बैंगनी --- तमाम रंग छिटक आते पश्चिमी आकाश में। एक स्याह रेखा उभरती धीमे से और धीरे धीरे कोहरे की तरह समूचे आकाश में जाल फेंक देती। स्याह आकाश में ढेरो तारे छिटक आते। वह उन्हें एकटक देखती। ढेरों कल्पनाएँ पसरती। कभी तारों का झूला बनता ,कभी चांदनी टहलती लगती ,मुस्कुरा कर पत्ते पत्ते छूती हुई। मंत्रमुग्ध उस चांदनी के साथ हौले से डोलती। भीतर जैसे बादल का कोई टुकड़ा घुस आता। बूँद बूँद टपकता हर क्षण और वह भीगती जाती ,हौले से प्रतिक्षण।
जब दोपहर की धुप अलसाई सी पसरती थी तो भी वह चुपचाप उठ जाती थी ,बाग़ में ऊंघते पेड़ ,पानी में सर डुबो कर फुर्र से उड़ती चिड़ियाँ ,कंही पेड़ो की शाखों से नीचे उतरती मचलती गिलहरियां। जाने कितना वक्त गुजर जाता। एक खूबसूरत संसार रच आता उसके चारों इर्द गिर्द। कल्पनाओं का संसार घुलता जाता। उसे यह अच्छा लगता था ,जैसे एक पेंटिंग कर ले ,या फिर कोई खूबसूरत विरल राग सुन ले। तमाम परिचित रागों के बीच एक अपूर्व विरल राग।
कल्पना के उस संसार में रिश्तों की पहचान भी जैसे बदलने लगती।कल्पना की अम्मा कलफदार साड़ी में ब्राउनिंग की कविता पढ़तीं,बाऊ बात-बात पर कालिदास को कोट करते और रविदा पूरे कैनवस पर डूबते सूरज के तमाम रंग उसके सामने रख देता और कहता,"पगली यही है ना तेरा सन सेट.ढेर ढेर रंगों वाला.." और वह चहक कर उसके गले में हाथ डालती और कहती, "और भी खूब है.संगीत की तरह झर-झर झरता झरना,हरे भरे पत्तों वाला जंगल,कुहासे से ढके पहाड़...."रवि दा फिल्मी अंदाज में उसके बालों को छितरा कर कहता, "इतना लालच,यशी?"

    उसे अंधेरे में हिलते दरख्तों का साया कभी खौफनाक नहीं लगा. शाखों पर बैठे उल्लू की आंखें कभी भयानक नहीं लगीं. सन्नाटे का भी एक संगीत था, जो धुएं की तरह धीरे धीरे उठता,उसे घेर लेता और वह बेसुध सी हो जाती- बिलकुल.एक अर्पूव राग फूट निकलता था,शब्दहीन राग.शेष जैसे सब कुछ फिसल जाता,बस वह राग उसके आसपास होता.
  पर सहसा जैसे सब कुछ बेसुरा हो जाता.अम्मा का कर्कश स्वर रोक देता, "कोई शऊर नहीं है लड़की को! शाम न दीया न बाती,बस छत पर चुड़ैलों की तरह बैठ कर जाने क्या ताकती रहती है लड़की?"
वह चौंक जाती जैसे जंगल के घने अंधेरे में दुबकते जानवर यकायक रोशनी के चुंधियाते घेरे में आ जाएं.वह सहम जाती.और फिर मनुहार भरे शब्दों में कहती, "अम्मा देख तो काली साड़ी पर ढेरों सीपीयां.....ला दोगी न ऐसी साड़ी?" उनके गले में बांहें डाल देती.
मां का चेहरा वैसा ही सख्त तना रहता," चल कलमुंही. बौरा जाएगी किसी रोज.जाने कौन हवा-डवा लग जाए.औरत जात ठहरी."
वह हंस पड़ती अम्मा की चिंता पर.
संगीत की वह लहरी एक बार जो थमती,फिर कहां जुड़ पाती.उसने पहली बार महसूस किया था कि अकेले रहने की खामोशी के बावजूद कुछ आवाजें होती हैं,जो सपने की तरह चुपचाप आती हैं,उस अकेलेपन  की नीरवता में.चुपचाप छू जाती हैं.एक कंपन सा होता है,जैसे कोई संकेत सा  दे जाता है.
मां की झिड़की पर भीतर आते ही सब गड्डमड्ड होने लगता.सीधे पल्ले की धोती में अम्मा,दफ्तर की फाइलें नितटाते घुन्ना बाऊ,हर बात पर उस पर रोब गांठने वाला रवि दा.ऐसे में कई बार वब तय कर डालती कि वह अकेले नहीं बैठेगी.नहीं सुनेगी वह स्वर लहरी.इस तरह अकेले में बुने गए सपनों और यर्थाथ के बीच का फासला उसके लिए असहनीय होने लगता.
कई बार अम्मा की झिड़कियों से तंग आ कर हमउम्र सहेलियों के बीच वह बैठ जाती.पर जल्दी हा उकता कर उठना पड़ता.कपड़े,जेवर रेसिपी ,यह संसार उसके लिए अजूबा था और वह खुद अजूबा थी उन लोगो के लिए.अकेली वह.शायद अकेली नहीं.एक भूली सी मुस्कुराहट झिझकती हुई उसके होंठो पर तैर गई.सुमेधा तब थी उसके साथ,हां सुमेधा.
      भूली यादों का परिंदा जैसे अचानक जिंदा हो उठा था और पंख फड़फड़ाने लगा था और पंख फड़फड़ाने लगा.उन्हें पकड़ने के लिए वह चलने लगी थी.धीमे से हाथ बढ़ा दिया. वह एक निजी संसार था, उन दोंनों का.सुमेधा के आने के बाद वे दोंनों साथ-साथ जीने लगी थी,एक निजी संसार को,जिसमें भागीदारी का दावा या वादा दोनों ने नहीं किया था.पर दोनों ने चुपचाप भीतर के उस हिस्से को एक तरंग में जीना शुरू कर दिया था.अकसर वे दोनों पढ़ाई के बहाने छत पर बैठा करती थीं.नीले साफ आकाश को,थिगलियों वाले आकाश को देखतीं,बादलों के बनते-बिगड़ते आकारों में ढेरों शक्लों ढ़ूढ़ती.शाम की रंगीन आभा और रात का दबे पांव चले आना.अमावस की रात तारों का छितरना देखतीं. पूर्णिमा के गोल चांद की आभा देखतीं.फूले कदंब की महक सांसों में भरतीं.बिजली के तारों पर दौड़ती बूंदों को देखतीं,गरमी की उमस-भरी शाम में शहर पर छाई पीली धुंध----कितना-कितना कुछ होता था एक साथ महसूस करने के लिए.
      शाम कितनी बार वे दोनों मंदिर के बहाने घाट पर जा कर बैठ जाती थीं.जेब खर्च के रूपयों को जोड़ कर नाव तय की जाती थी और नाव गंगा की धार में बह निकलती थी.घाटों की झिलमिलाती रोशनी,मंदिरों की घंटियों की आवाज में बहुत कुछ ढ़ूढ़ती मंत्र-मुग्ध. गरमी की रात में जागकर तारों को पहचानना हो या तेज बारिश की शाम भीगती हुई सुनसान सड़क पर चुपचाप चलना हो या तेज बारिश की शाम भीगती हुई सुनसान सड़क पर चुपचाप चलना हो,वे दोनों ही होती थीं. वह संसार था खूबसूरत,जिसे दोनों ने रचा था,या कुछ चीजों की खूबसूरती को आसपास रच लिया था.
"लेट अस कंटेंड नो मोर लव
स्टाइव नॉट वीप
ऑल बी एज बिफोर
लव ओनली स्लीप."
सुमेधा ब्राउनिंग की पंक्तियां गुनगुनाती.गुनगुनाती क्या,बस छेड़ देती थी अंधेरे में शब्दों को. नदी की भंवरों को छू कर अंधेरे में चलती हवा जैसे घुंघराली हो जाती थी और सारा वजूद जैसे गुम हो जाता था.वह हल्की सी आवाज होती थी या शायद आवाज भी नहीं,एक प्रवाह होता था, जो धीरे धीरे शब्द बन कर टूटने लगता.शब्द हवा के साथ महकी सांस की मांनिंद उस तक आते.उस सांस के मुक्त करने के लिए वह भी छेड़ती थी.
"बी ए गॉड एंड होल्ड मी
विद दाइ चार्म
बी ए मैन एंड फोल्ड मी
विद दाइ आर्म...."
सुमेधा हंसती थी."मैं ,यानि कि मैं बन जाऊं पुरुष?"
चिल्लर की सी खिलखिलाहट लहरों पर बिखर जाती.चांदनी कुछ ज्यादा पीली है.यह उसका सवाल होता अकसर.पर उसे याद है,उस दिन वे नहीं हंसे थे.न ब्राउनिंग की पंक्तियां ही गुनगुनाई थीं.क्यों कि उन्हें एक यथार्थ जो मिल गया था.वे कॉलेज में नई आई थीं.नेहा मैडम,यहां वे दो महीने पहले ही आईं थीं.उन दोनों का अंतिम वर्ष था एम,ए का.कॉलेज की कुछ-कुछ उदास सी लेक्चरर.खुलता सांवला रंग,लंबे घुंघराले बाल,चेहरा जैसे बोलता था.दरअसल वे अलग लगीं थीं. अमूमन कॉलेज की अन्य अध्यापिकाओं के चेहरे एक से लगते थे. चेहरा सख्त. पर नेहा मैडम का चेहरा पारदर्शी था एकदम.भीतर का तमाम कुछ चेहरे पर झाईं की तरह फैला.और उसी ने शायद उन दोनों को ही नहीं और लड़कियों को भी आकर्षित किया था.
सुमेधा कहा करती थी कि जब वे हंसती हैं तो उनके शब्दों से ज्यादा उनकी उदास आंखें बोलती हैं.उसने भी पढ़ने की कोशिश की थी,धूप के पीले पत्तों की तरह उदास मुसकराहट थी उनके चेहरे पर चिपकी हुई.जैसे किसी ने कभी चिपका दिया हो और फिर वापस ले जाना भूल गया हो.उन्हें लगा था कि वे जो हैं,वह नहीं.पुराने नोट्स देने के बहाने एक दिन दोनों ही पहुंची थीं.बारिश की एक शाम अचानक ही.एम,ए. करने के बाद के निरूद्देश्य से दिन थे वे.
धुंधली सी शाम थी.वह अपने क्वार्टर की बालकनी में बैठी बरसात की बूंदों को देख रही थीं.लगभग भीगी हुई थीं,पर जाने किसे खोज रही थीं उस बारिश में.
"आप तो भीग गयी हैं ,मैडम!"  सुमेधा ने ही पहले कहा था.
वे चौंकी थीं और उन दोनों को देखा था.चिपकी मुसकराहट क्षणांश के लिए तितली बन गयी थी.चेहरा बारिश में निखर आया था.अपनी ही खिली मुसकराहट में जैसे वे नहा गईं थीं.शायद वे समझ गयीं थीं कि नोट्स तो बहाना था. शाम उनके साथ चाय पी कर लौटने लगीं तो उन्होंने आते रहने का आग्रह किया था.
फिर तो कभी-कभी शाम को सैर के बाद उनके पास बैठने लगी थीं दोनों.उम्र में वे उन दोनों से पांच एक वर्ष बड़ी रही होंगी.
"अकेली हैं आप?" सुमेधा ने ही पूछा था.इस तरह की जल्दबाजी उसी की आदतों में शुमार थी.उसने और सुमेधा ने दुर्ग को जैसे भेदने की कोशिश की थी..सवाल था कि गरम तपती सी छुअन थी, जिसने धीरे कोई असर किया था.
पहले तो वे चुप रही थीं, उस प्रश्न पर.सिर्फ सिर हिला दिया था.फिर हौले से हंसी थीं.
"हां, अकेली ही रहने आई थी यहां.सब कुछ छोड़ कर."
सुमेधा ने यशी को देखा था.आंखों में कुछ चमका था. उस शाम वे फिर बोली थीं, "तुम लोग कभी शाम को आ जाया करो.शाम को या तो मैं अकेले होना चाहती हूं या किसी अच्छे साथ में और उस साथ की खुमारी में जीना चाहती हूं. तुम दोनों का साथ मुझे अच्छा ही लगेगा."
वे दोनों उनके सुख के संग खेलना नहीं चाहती थीं, पर उनके साथ के सुख को दबोच भी लेना चाहती थीं. नेहा मैडम ने उनकी दुविधा से उन्हें बचा लिया था.दूसरी दुविधा से भी. मैडम शब्द में एक खालीपन था.उन्होंने ही कहा था कि वे दोनों उन्हें दी कहा करें.
मैडम से दी बनने के बाद खोल दी थी उन्होंने एक एक परत.हर परत के शाथ उनके चेहरे पर जैसे एक छांह सी पसर जाती थी,उनके खूबसूरत सांवले चेहरे पर.
उस शाम उनके चेहरे की वह छांह कांप रही थी.
"भूलना चाहती हूं, सब कुछ . पर सोचती हूं भूलूंगी तो वह सब कुछ खो जाएगा सदा के लिए. है न. मैं उन्हें खोना नहीं चाहती.तभी न सब कुछ स्वीकार किया है, यह अकेलापन....कुछ धुंधला पड़ने लगता है तो फिर याद करती हूं. फर्क सिर्फ इतना है कि अब दर्द नहीं होता."
उन्होंने ही बताया था कि वे यहां आयी थी तो यही सोच कर.वे मुक्त होने की कोशिश में थीं. यह धर्मनगरी पापों से ही नहीं,बंधनों से भी मुक्त कर देती है.उन्हें अतीत के दंश से मुक्ति चाहिए थी. तमाम बंधनों,रिश्तों से मुक्त हो वे आध्यात्मिक होने लगीं थीं. पर उन्हें अचानक लगा था कि इस तरह जीना पाप है.
एक भरा पूरा सपना जिया था उन्होंने. वह भी टुकड़ों में नहीं, पूरा -का-पूरा जिया था. दो साल तक. वह चित्रकार थे और नेहा दी उनसे मिलीं थीं एक शो के दौरान.
नेहा दी ने जब बताया था तो इंद्रधनुष के सातों रंग उमके चेहरे पर बिखर गए थे. मानो वे तमाम क्षण उनके चेहरे पर उभर जाते थे.
"जो कुछ देखा था, या जो कुछ जिया था, क्या वह एक सपना भर था."
"आइ वांट टू डाई व्हाइल यू लव मी"--- नेहा दी ने बताया था कि वे अकसर कहा करते थे. किया भी तो था ढेर ढेर प्यार. वह प्यार जो सिर्फ प्यार होता है. आंखों से उतरता, हथेलियों में फैलता, मन को भिगोता एक दूसरे को दिया जाने वाला कोमल स्पर्श. मन का वह स्पर्श जिसके तहत जीवन के कुछ खूबसूरत क्षण एक-दूसरे की सौगात बन जाते हैं, पूरी उम्र के लिए. जरूरी नहीं कि वे क्षण शरीर से जुड़े हों.
"देह तो सब कुछ भूल जाती है , यशी. देह पर के निशान मिट जाते हैं. मोह के क्षण गुजर जाते हैं देह पर से. चाहने पर भी उन्हें उसी तरह याद नहीं किया जा सकता. पर मन से जुड़े कोमल क्षण, उन्हें भूलने के लिए एक उम्र नाकाफी होती है."
उन्होंने बताया था कि उन क्षणों को भुलाना,उन्हें मिटा कर जीना उनके लिए संभव नहीं था. वह जिसके लिए एक पूरी जिंदगी नाकाफी थी,उसे ही मोह माया मानना----" मुझे लगा उन क्षणों के साथ विश्वासघात कर रही हूं.नहीं करना चाहती थी मैं." उस वाक्य के साथ कुछ फैल गया था उनकी आंखों में.धुंधला नहीं बल्कि कुछ साफ,ठोस.
उन मोहक क्षणों के कुछ अंश बांटे थे उन्होंने. उन्होंने बताया था कि किस तरह अकसर चट्टानों के पास रात भर बैठते थे ----शोर सुनते हुए. शाम के डूबते सूरज का अर्थ उसके ही सामीप्य ने उन्हें बताया था या फिर उन रंगों ने,जो उसमे कैनवस पर बिखेर दिए थे.
वह अकसर कहा करती थी ,"पता है,वह सुख था जिसे मेरे भीतर की लड़की ने चाव से संजोया था. चूंकि वह उसी उम्र का का अनुभव था,इसलिए बहुत चाव से संजोया था. वह सुख था, जो भय और पीड़ा की अनुभूतियों के बीच निकलता था.फिर भी उसे जीती रहती थी मैं."
वह सुख था जो अचानक ही उससे छीन लिया गया था. वह किसी फोटोग्राफर्स सोसाइटी के साथ लेह गया था.उसे तो इतना भर मालुम था. फिर वह लौट कर नहीं आया. दल के लोगों ने बताया था कि उसकी एडवेंचर वाली प्रवृति ही उसकी मौत का कारण बनी. किसी खास स्पॅाट पर से फोटो खींचने की धुन में पैर फिसल गया और घाटियों में कहां लुढ़कता चला गया, पता ही नहां लग पाया. नीचे बहता पहाड़ी नाला और वह स्पॅाट, जहां से उसे चित्र लेना था-- शायद वह फासला ही उसकी मौत का कारण बना. मौत. नेहा दी उसे स्वीकार नहीं कर पाईं थीं. वह मौत कैसे हो सकती थी. उन क्षणों को तो वह जीना कहा करता था. उन क्षणों में मरने की बात कैसे सोच सकता था वह. नेहा दी वह सब बातें बताते हुए कांप रही थीं. एक लौ थी जो चेहरे पर दिपदिपाती हुई सरक गई थी. फिर अचानक एक धुंध छा गया था पूरे वजूद में. वह धुंध, जिससे वे हमेशा लिपटी रहती थीं.
जाने के पहले की रात उन्हें बखूबी याद थी. उसके लौटने पर जिंदगी का वह निर्णय जो उन्हें साझे में लेना था. वह फिर लिया ही नहीं गया. फिर तो न शाम के रंग रह गए थे, न लहरों का संगीत ही कुछ कहने लायक रह गया था. बस, बांझ दुख था शेष. किसी और तरह अलग होते तो शायद एक दूसरे के अहं से टकरा कर ही या एक दूसरे की पीड़ा से टकरा कर ही सब खत्म होता. पर यहां तो जैसे एक सिरा ही डूब गया था. डूबा क्या उनके भीतर ही गहरे उतर गया था.
"कुछ दिन तो लगा था, मेरे जीने का अर्थ ही खो गया है. आत्महत्या करने की कोशिश की थी मैंने. पर फिर जैसे किसी ने भीतर से कहा था--- जीवित ही न रही तो उन क्षणों को कैसे जी सकती हूं. आज भी .मौत के लिए शरीर की क्लीनिकल डेथ जरूरी नहीं,शरीर यूं भी कहां रह गया है."
          "दी, आपने शादी क्यों नहीं की? सपने जब नहीं मरते तो उन सपनों के साथ जीने के लिए कोई और सही व्यक्ति तलाश सकती थीं?" सुमेधा ने एक दिन सवाल किया था. वह सवाल सुमेधा ही कर सकती थी. उसका एहसास तो यशी को बहुत बाद में हुआ था,
         दी हसीं थीं.शायद ऐसे वाक्य उनके लिए अजूबे नहीं थे. अप्रत्याशित भी नहीं रहे होंगें.
" विवाह तो हो सकता था,.अगर विवाह ही करना चाहती तो. पर फिर क्या होता? शेयर होती एक जिंदगी, देह सब कुछ. पर, वे सपने कहीं हो पाते? इतना माद्दा तो था नहीं कि अपने बुने सपनों के खांचों में किसी और को फिट करती. जिसे ले कर बुने थे, वही उन्हें अधूरा छोड़ कर चला गया ......?
"हो सकता था, नेहा दी की जिंदगी में जो आता, वह चित्रकार की ही तरह होता." सुमेधा ने वह बात कही थी, जब वे दोनों अकेले थीं. झुंझलाहट थी उसकी आवाज में, एक हलकी सी खीज. "प्यार एक नदी की तरह प्रवाह होता है, यशी! वह एक ही जगह रूक जाए तो पानी की तरह सड़ने लगता है."
"नहीं," उसने एक निश्चित स्वर में कहा था. "नहीं हो सकता ऐसा."
"क्यों" सुमेधा ने पूछा था.
यशी तब उसे समझा नहीं पाई थी कि सपने तो दी के भीतर की लड़की ने बुने थे. उसे आगे तक ले जाने की जिम्मेदारी भीतर की औरत की कहां से होती. विवाह लड़की को क्षणांश में औरत बना देता है. सिर्फ देह से शुरू होने वाला एक रिश्ता. बिना जाने, समझे, सुने. बिना किसी सपने के लड़की के भीतर की औरत का विवाह होता है. विवाह औरत को बाहर खींच निकालता है. पति, बच्चे, घर के बीच घूमने वाला एक निश्चित दायरा. औरत वहीं होती है. लड़की तो मंडप से ही कहीं गुम हो जाती है. ढेर सारे सपनों की जगह ढेर सारी हिदायतें, उपदेश. सात फेरे लेने वाला सपनों का साथी नहीं होता. वह बंधे बंधाए नियमों का दायित्व सौंपने वाला होता है. चित्रकार प्रेमी दी के सपनों को बांटता--घर और नियम उसके लिए दोयम होते. देह उसके लिए गौण होती. पर समझा कहां पाई थी उसे. खुद वह भी तो उतना स्पष्ट नहीं समझ पाई थी.
     उसकी बात को सुमेधा नहीं समझ पाई थी.शायद समझ भी पाती तो बहस करती. उसका कहना था कि लड़कियां जो सपने पालती हैं, चांदनी का, तारों का, फूलों का, घाटियों का---- यानि किसी उस पार का सपना और उसकी प्रतीक्षा करते किसी राजकुमार का--- वह होता है उसी तरह प्रतीक्षारत. चाहे किसी रास्ते से जाओ. विवाह हो या नेहा दीदी वाला प्रेम.
     हांलाकि यह बात उसने नेहा दी से नहीं कही थी. उसका कहना था कि यह कह कर वह उन्हें दुःखी नहीं कर सकती.
    सुमेधा ने किया भी तो यही था. वैसा ही कुछ. उस शाम शब्दों के लिए यशी कुलबुलाई थी, जब सुमेधा ने बताया था कि उसका विवाह तय हो रहा है, पुरी में किसी बड़ी फर्म था वह. शादी के बाद चली जाएगी.
  "तुम उसे जानती हो?" उसने पूछा था.
"न" सुमेधा ने सर हिलाया था. "देखो, जब तक नहीं जानती ढीक तो है. फिर तुम्हें पता नहीं शायद कि शादी के बाद कि शादी के बाज शुरू में एक मैजिकल ट्रिक होता है, सम्मोहन. कई बातों को अपने ढंग से मनवा लेने का."
   सुमेधा के भीतर की औरत बड़ी हो गई थी या यशी ने ही ऐसा महसूस किया था. उस शाम सुमेधा ने दीपदान किया था, गंगा की लहरों में. तब दोनों नहीं जानती थीं कि एक संसार था जो बह गया था उन लहरों में. पर उस शाम कोई पंक्ति नहीं थी उन दोनों के पास.
 सुमेधा ने कहा था, "कुछ बहा दिया,यशी, कुछ तुझे सौंप रही हूं. कुछ मेरे पास है. जो तेरे हिस्से का है, उसे संभाल कर रखना. अकेली जो है." और सुमेधा चली गयी थी. उसके पत्र नहीं आए. पर वह सोचती रही थी कि वह लिख रही होगी, ढेरों ढेरों बातें हवा में, चांदनी में, पत्तों में, समुद्र की उद्दाम लहरों में--- उसके नाम और वह सब साथ लाएगी. वह खोजा करती थी अकेले में उसकी .बातों को. 
  पर सुमेधा लौटी थी तो जेवरों से लद कर, चेहरे पर दांपत्य की तृप्ति लिये. गंगा घाट की जगह उसे शॅापिंग पर जाना था, पिक्चर देखनी थी. अब जैसे कुछ नहीं रह गया था सुमेधा के पास यशी के लिए. क्षण भी नहीं, क्षणों की सौगात किसी और के लिए हो गयी थी. सुमेधा औरत हो गई थी, सचमुच की औरत. लड़की सपनों की मौत बरदाश्त नहीं कर पाती, पर औरत सपनों की मौत में निस्संग रहती है. शायद उन्हें दफना भी देती है. सुमेधा और यशी के बीच का पुल टूट गया था. 
यशी को तब दुःख हुआ था. शायद वह भूल गई थी कि व्यक्ति नहीं होते, कि जैसे रख दो, वर्षों बाद भी वैसे ही रखे रहें. अलग होने के बाद जिंदगी भी अलग हो जाती है और धीरे धीरे नयी जिंदगी के आदी होने लगते हैं.पुरानी जिंदगी सड़ने लगती है, वह जिंदगी जो एक साथ जी गयी थी. पर यशी को लगा था वह अभी भी वहीं प्रतीक्षा में. यह तो सुमेधा थी जिसने पुरानी जिंदगी को निर्ममता से खत्म कर दिया था. 
जाने के पहले उसने कोशिश की थी, एक शाम सुमेधा के साथ गंगा घाट जाने की. पर सुमेधा को मंदिर जाना था आरती के लिए. ससुरालियों की मनौती पूरी करने. जेवरों से लदी-फदी सुमेधा के साथ वह भी मंदिर हो आई थी. फिर कुछ नहीं बचा था. उसे लगा था कि उसके हिस्से का तो उसके पास था, वह रह गया था, पर सुमेधा के पास जो था, वह सब कुछ बह गया था. वही गलत थी जो खोज रही थी हवा में, पत्तियों में अनगिनत शब्दों को.
नेहा दी भी चली गयीं थी अचानक इसी बीच. किसी पहाड़ी स्थान पर उन्हें नौकरी मिल गई थी. वे इस शोर से दूर चली जाना चाहती थीं. उन्हीं पहाड़ों के बीच, जहां उनका सपना खो गया था. यही कहा था उन्होंने तब. पहाड़ी धुंध की तरह गुम हो गया था सब कुछ. उनका अचानक यूं चले जाना. वर्षा के बाद बुरूंश की लटकती शाखों पर धूप की बूंदें जैसे चमक जाती हैं, ठीक वैसे ही उनकी बातें थीं, वे शब्द थे जो यशी को याद आ जाया करते थे. वे ढेर ढेर शब्दों की नमी छोड़ गयीं थीं पीछे. 
सुमेधा लौटने के पहले विदा लेने आई थी तो उससे रहा नहीं गया था. दूर का सफर था और फिर उसके नए दायित्व. इसलिए लौट जाने की जल्दी थी. उस शाम वह उसके यहां आई थी, औपचारिकता के तहत. मां ने खाने पर बुलाया था. उसने सोचा था सुमेधा इसी बहाने पूरे दिन के लिए आएगी. पर वह शाम को आई. झुंझलाती हुई यशी पर कि उसने पैकिंग, शापिंग में मदद नहीं की. शाम क्या रात घिरने लगी थी-- तिसपर मां के पास बीच-बीच में चौके में रेसिपी के बारे में बतियाने चली जाती. मां ने उसे घूर कर देखा था. सुमेधा की सुघड़ता उन्हें भली लगी थी. उससे रहा नहीं गया था, उसने पूछ लिया था---
"सुमेधा, तुम्हें नहीं लगता कि कुछ छूट गया है, या कि  तुमने कुछ छोड़ दिया है ." वह क्षणांश के लिए रुकी थी. कुछ तैर गया था या कि बस  छू कर चमक गया था उन आंखों में. शायद यह उसका भ्रम था. फिर आंखों में हंसी चमक आई.
"बस अब तो फुरसत ही नहीं रहती कुछ सोचने की. जिंदगी इत्ता भागती है कि बस...." वह हंसी थी बेवजह की खनखनाती हंसी. हंसी जो एक भरपूर औरत की थी. उस हंसी में अब वे घुंघराली लहरें नहीं थीं. एक सपाट वीरानी थी. खौफनाक.
"सच कहो एक दूसरे के होने के एहसास को क्या हम इस तरह जीते थे. इस तरह शॅापिंग करते, चाट की पत्तलें चाटते या फिर मंदिर की आरती देखते." वह फूट पड़ी थी.
"छूट जाता है सब कुछ यशी. तू भी छोड़ देगी." स्वर में एक भारीपन आ गया था. झील का सा ठहरा हुआ भारीपन. ठोस और सख्त. उसकी देह की तरह उसके स्वर में भी एक भारीपन आ गया था.
"ऐसा ही होता है ,यशी. होगा तेरे साथ भी. तुम इसे रोके से नहीं रोक सकतीं. दिस इज टुथ. इस होने के सामने हम कुछ नहीं कर सकते. वह हर एक के साथ होता है." "तू उसे कैसे रोक पाएगी?
तुमने चुना कहां है? जो हुआ है उसकी आदी हो गई हो." वह चिढ़ कर बोली थी.
वह मुसकराई थी. पहले कभी अगर उसने कहा होता तो शायद वह तमक उठती.
पर तब शांत तृप्त मुस्कुराहट से भरकर बोली थी, "पता है चाची अभी चौके में क्या कह रही थींपुरूष की रूचि, आदतें, अपेक्षाएं औरतों की आदत बन जातीं हैं."
"माय फुट," देर तक कसमसाती खामोशी पसरी रही दोनों के बीच
"पर नेहा दी...." वह बुदबुदाई थी.
सुमेधा ने उसे गौर से देखा था, "सब नेहा दी की तरह नहीं होते .यशी. पता है, यथार्थ उस सूरज की तरह है, जिसके उगते ही सारे सपने बिला जाते हैं. नेहा दी ने यथार्थ झेला कहां था?"
"तो विवाह यथार्थ है."
"हां, बेशक यथार्थ है. और यशी मेरे पास उससे पहले कोई सपना था भी नहीं, इसलिए मैंने इसी सथार्थ के इर्द- गिर्द सपने बुन लिये हैं."
यशी ने महसूस किया कि वहां यथार्थ आगे निकल गया था, सपनों को पीछे ढकेल कर और यथार्थ ही सपना हो गया था. एक दूसरी जिंदगी जीने लगी थी वह. और उसकी जिंदगी का सपना अलग था, बहुत अलग. सुमेधा औरत हो गई थी. उस रिश्ते के जुड़ते ही,जिसकी शुरूआत ही औरत से होती है. सपने देखती नड़की को बिना किसी पुल के सहारे सीधे औरत की दुनिया में ले जाते हैं. लड़की देह का सब क्षणांश में झील में तब्दील हो जाता है. औरत की झील-- जिसमें छोटी-छोटी लहरें तो उठती हैं, पर ज्वार नहीं आता. सुमेधा में कोई ज्वार नहां बचा था. वह झील हो गयी थी. औरत हो गई थी. सुमेधा ने जो संसार छोड़ दिया था, उसमें वह अकेली हो गई थी. 
   उसने कोशिश की थी उन तमाम कोनों को छूने की, जो तस्सली देते थे, पर हाथ जैसे खाली लौट आए थे. उसे लगा था, वह उस लड़की की तरह हो गई थी जो पुराने खंडहरों में अपना नाम खोजने लगती है. खंडहर हो गए उस रिशते में कुछ भी तो नहीं बचा था. शेष था सिर्फ खालीपन, जो भर नहीं पाया. बावजूद इसके कि कहीं उसने महसूस किया था कि सुमेधा की आंखों में कुछ बुझा सा उतर आया था. पर उसे लगा था कि वह भी सुमेधा के भीतर का औरतपन है. मायूस हो झरने की सी जिन्दगी को याद करने का  खूबसूरत सा अभिनय. उसकी आवाज में बुने हुए झूठ को वह भाहर कर सकती थी. फायदा भी कुछ नहीं था , उसे लगा. एक लकीर थी जो दोनों के बीच कहीं गुम हो गई थी. कहां कैसे मिट गई पता नहीं लगा. वह होती तो उसके सहारे एक दूसरे तक पहुंचा जा सकता था.
  वह अकेली छूट गई थी उस संसार में. नेहा दी की अनुपसि्थति उसे बहुत खलती थी. वे होतीं तो उनसे सब कुछ शेयर करती. उसे बहुत आश्चर्य हुआ था कि सुमेधा को , जिसको उसने अपने तमाम दिन सौंपें थे, उसके तहत ब्याज भी नहीं बचा था उसके लिए.
  मां की टोका-टाकी, सहेलियों की कानाफूसी के बावजूद वह अपने संसार में अकेली थी.----सन्नाटे के विरल राग को सुनती. दोपहर हो या शाम, एक और आवाज थी जिसे वह अकेले में सुना करती थी. वे दिन जैसे नींद के झोंकों में लुढ़कने लगते.
  मां ने ही तो उसे सुना कर एक दिन कहा था,"बस कुछ दिन और बैठ लो अकेले. फिर अकेले बैठने को कहां मिलेगा." तो उसे लगा था कि उसके शांत संसार में किसी का अतिक्रमण होने जा रहा है. वह अस्त-व्यस्त हो गई थी. उसका संसार अब छोटा था, जिसमें वह थी और उसका एकांत. मां के अलावा उस एकांत में खलल डालने वाला कोई नहीं था. उसने जैसे एकांत में जीते जीते सुख को उंगली रख कर पहचानना सीख लिया था. वह लड़की थी--- शायद इसलिए उसने अपने को और नहीं खोया था. वह होती, उसका एकांत होता, ब्राउनिंग की कविता होती. 
"बाऊ बात पक्की कर आए हैं. उन लोगों ने तुम्हें बिन्नी की शादी में देखा था. लड़के ने तुझे पसंद कर लिया है." मां मुग्ध हो आई थी अंतिम बात कहते-कहते.
पर वह उदास हो गयी थी.कुछ छिनने से पहले ही दहशत भरी उदासी
"उसे नहीं जानती मैं." मां से कहा था.
"येल्लो, हमने तो तुम्हारे बाऊ जी को शादी के एक हफ्ते बाद देखा था. तुम तो पहले ही देख लो." मां ने उसे जबरन एक फोटोग्राफ थमा दिया था.
मां ने ही बताया था कि वह सेल्सरिप्रेजेन्टेटिव है. कुछ खबर सुमेधा ने बताई थी.
"तुझे आदत पड़ जाएगी ,यशी." उसने समझाया था. उसके चेहरे पर कोई भाव न देख कर शायद उसे खुश करने के लिहाज से बोली थी, "पर हो सकता है वह वैसा ही हो जैसा नेहा दी का चित्रकार, या फिर तेरे सपनो का राजकुमार......जो उस पार हो." उसने गुदगुदाया था.
पर उसे कोई गुदगुदी नहीं हुई थी. वह चुपचाप उठ आई थी सुमेधा के पास से.
कैसा होगा. गंभीर,शरारती या फिर सपाट जिंदगी जीने वाला, क्षणों को नोटों में तब्दील करने वाला. इंक्रीमेंट और परिवार की चिंता करने वाला, सुबह अखबार, दिन दफ्तर, शाम शॅापिंग या सोशल विजिट. ऱात एकरस तरीके से दांपत्य निभाने वाला पति. या फिर उसके साथ वह सब कुछ जीने वाला, जिसे वह जीती है. सुबह के धुंधलके में ओस से नम घास पर पांव रख कर चलने वाला, शाम के रंगों को उसके साथ महसूस करने वाला, लहरों के शोर, बारिश की फुहारों, पहाड़ों की चुप्पी, घाटियों के आमंत्रण को महसूस करने वाला. 
  सबसे आश्वस्ति की बात यह थी कि आजकल अम्मा की टोकाटाकी बिल्कुल बंद थी.मुसकरा कर बोली,"रह लो जितने दिन रहना है अकेले. फिर कहां रहने देगा वह तुझे अकेले."
वह छत पर अकेले होती.कल्पनाओं के ढेर-ढेर रंग अपने पास रख लिए थे. मनचाहे रंग. नेहा दी के चित्रकार प्रेमी की तरह ढेरों ट्यूब्स. सन्नाटा जैसे एक खूबसूरत कैनवस बन गया था. रोज एक न एक पेन्टिंग तैयार होती. 
वह अनदेखा व्यक्ति उसकी नींद होने लगा था. सन्नाटे के विरल राग को उसके साथ सुनता हुआ. वह सांझ को पीती बैठी रहती. बालों में उसके स्पर्श को महसूस करती, आंखों से जैसे उसे वह छूने लगी थी, महसूस करने लगी थी.एक आकार ने जन्म लिया था भीतर. वह यानि शेखर. चित्र का वह मुस्कुराता हुआ चेहरा.
वह सुबह जल्दी उठा करेगा, ठीक उसी की तरह. सुबह के हल्के उजास को धीमे से महसूस करता हुआ. हल्के उजास में नंगे पांव चलेगे दोनों घास पर. सुबह चाय की चुस्कियों के साथ होंगी वे बातें. कितनी ही पंक्तियां होंगी एक दूसरे को सुनाने के लिए. खाना बनाएगी तब भी तो रसोई के स्लैब पर बैठ कर ढेर-ढेर बातें करेगा. गले में बाहें डालेगा, वह चिहुकेगी तो कहेगा, "पसीना पोंछ रहा था , य़शी."
वे बाहर घूमने जाएंगे तो जुड़े हाथों में एक -दूसरे का एहसास दोंनो के बीच पसीजेगा.
इसी तरह की शाम होगी. वह उसकी जांघों पर कोहनियां टिकाए उसकी आंखों में पूरा आकाश देखेगी. सिंदूरी रंग के तमाम शेड्स, फिर इर्द-गिर्द की स्याह रेखाएं उसे वह दिखाएगी- वह उसे पास खींच लेगा और देर तक उसे देखता रहेगा. वह कुछ कहेगी तो कहेगा, हिश्श ,रंग झर जाएंगे. और सचमुच रंग झरने लगेंगे और स्याह अंधेरा दोनों को घेरने लगेगा तब उठेंगे वे दोंनो, धीमे से दबे पांव आती चांदनीं में.
वह गुनगुनाएगी इसी तरह--- "आइ वांट टु डाई व्हाइल  यू लव मी....... व्हाइल यू यट हौल्ड मी फेयर."

वह उसके माथे पर होंठ रख देगा. वह उसकी आंखों के पिघलते रंगों को देखेगी.धीरे - धीरे झरेंगे दिन रात के एहसास.
लहरों का शोर पीएगी शेखर के साथ रात-भर. रात का धीरे- धीरे गहराना, चांदनी का छितराना-- समुद्र में प्रतिक्षण उठता ज्वार....
"यहीं रह जाएं रात- भर." वह कहेगी
"पगली है तू भी, यहीं इसी चट्टान पर?" वह उससे पूछेगा
"हां, यहीं." दोनों वहीं रहेंगे. रात उनींदी आंंखों में उतर आएगी, समुद्र में उतर जाएगी, समुद्र की गहराई में,
"इतनी प्यास अच्छी नहीं होती, यशी!" वह बुदबुदाएगा
"न हो, क्या होगा? यही न कि जिंदगी खत्म हो जाएगी जल्दी. पर मेरा उसूल है कि जिंदगी भले ही खत्म हो जाए, जिंदगी को महसूस करना चाहिए उसके भीतर घुल कर, अलग हो कर नहीं, जिंदगी की चाहत कभी खत्म न हो. न तुम्हारी नौकरी हो. न मेरा घर, बस हम दोनो और यह तरंग....." वह उसे कस लेगा अपने साथ.
      चुप्पा उदास लड़की एक जिदियाती लड़की में बदल जाएगी . अपने ढंग से जीवन को जीने के लिए मचलती लड़की , यशी. जीवन को जीवन की तरह ले कर चलने वाली औरत यशी नहीं. बल्कि प्रतिक्षण लहरों की तरह भीतर की तमाम इच्छाओं को लपेटती, हरहराती उद्दाम लहरों वाली यशी.
अक्सर शाम के धुंधलके में पड़ोस की युवती पति के साथ स्कूटर पर घूमने निकलती. उसकी कल्पना के रंग भरने लगते. वह भी घूमने जाएगी. खाना दोंनो बाहर खाएंगे. उसकी जिद पर वह गाड़ी मोड़ देगा कहीं और----
"सुनो.."
"हां...." सिगरेट फूंकता, खोया सा उत्तर देगा.
"मै क्या आॅक्वर्ड लग रही हूं?"
"नहीं तो."
सिगरेट की राख झाड़ता वह उसे भरपूर आंखों से देखेगा
"फिर... वह कोने में बैठा आदमी क्यों घूर रहा है."
"हां! हां, गलत तो है"
"क्या?"
"तेरी खूबसूरती, ये बड़ी तीखी आंखें, गठा हुआ शरीर"
"सच्ची ई..ई" वह खिल कर पूछेगी, रात घर लौट कर  शीशे में अपने को भरपूर देखेगी.
"विश्वास नहीं है मुझ पर....." वह पीछे से आ कर उसके गले में बांहें डालेगा. यह जानते हुए भी कि वह खास आकर्षक नहीं है, वह मुस्कुराएगी किसी गर्विता नायिका की तरह. पर शेखर शब्दों के स्पर्शों से अभिभूत कर देगा. खूबसूरत से लगने वाले शब्द, जिन्हें सुनने के बाद वह खुद को टटोलने लगेगी.
वह जीने लगी थी एक सपने को.
वह वाक्य होगा कि उसकी  देह समुद्र बन जाएगी.
वह समुद्र बन कर जीना चाहती है, झरने की तरह उछलती, भागती जीना चाहती है. न, उसे झील नहीं बनना. औरत बनते ही वो भोलापन जो बिला जाता है, वे सपने जो कहीं गुम हो जाते हैं, छटते कोहरे की तरह. वह देहगंध जिसमें वह लड़की की तरह जीती है, कब गायब हो जाती है. पर वह . वह बचाए रखेगी भीतर की वह देहगंध. उसी के सहारे उसे ढ़ूढ़ता आएगा शेखर.
सुमेधा की तरह वह पहचान देह से शुरू नहीं करेगी.
नेहा दी सच कहा करतीं थीं. कहती थीं--- "औरत बनने के बाद तो सपनों की मौत पर आंसू भी नहीं आते. लड़की जहां पीड़ा की परत में लिपटे सुख को खोज लाती है, वहीं औरत के लिए सुख भी त्याज्य होता है. डायरी में रखे सूखे फूल की तरह. उसके लिए पीड़ा का अर्थ सिर्फ प्रसव पीड़ा से जुड़ता है, और कुछ नहीं."
"दी, मैं पीड़ा और उससे जुड़ी खुमारी दोनों को जीना चाहती हूं." उसने कहा था तब.


वह खि़ड़की के पास से हट गयी. टी. वी. के उपर रखा चित्र. उसका और शेखर का, विवाह के लाल जोड़े में. उसके पास मुस्कुराता शेखर. विवाह का वह तमाम ताम झाम, मंत्रोच्चार, औरतों की भीड़ से घिरी वह---- और था वह, शेखर, जीता जागता शेखर. जिसे उसने देखा ही नहीं था और वह उसका पति हो गया था, कुछ ही अनुष्ठानों और मंत्रोच्चारों के बाद.
वही था जिसके साथ उसे सपने जोड़ने थे. मां और तमाम बुजुर्ग औरतों की हिदायतें, लाल जोड़े में औरत होने का एहसास दिलाते रहे. पर वह कहां तब्दील हो पोई थी. शेखर के साथ बम्बई आते हुए उसने आश्वस्त किया था खुद को.
पर यहां आते ही लड़की की उदासा सुरू हो गई थी. छोटा सा फ्लैट था- सिर्फ एक कमरे और रसोई का. जिसमें सिर्फ एक खिड़की थी, जिसमें से सामने के घर दिखते  थे. आसमान को देखने के लिए सिर उपर करना पड़ता था. एक टुकड़ा भर था उसके पास.पहली रात थी जब सिर्फ तीन- चार तारों वाला आसमान उसके हिस्से में था.
शेखर का सामीप्य और उसका भरपूर प्यार---- वह तो बाद में जान पाई की वह पुरूष का. पति का प्यार था, उसके राजकुमार का नहीं.
वह सात बजे उठता था और चाय उसे ही बनानी थी.
वह उठी थी आदतन सुबह. पुरूष की अपेक्षाएं, रूचियां औरत की आदत बन जाती हैं. सुमेधा ने कहा था.
न वह पहले दिन खिड़की के पास खड़ी थी अकेली. घास की ओस उसकी आंखों में उतर आई थी. बाहर के उजास में सब कुछ साफ होने लगा था और उसके भीतर सब कुछ धुंधला.
वह पहला दिन था और पहली शाम. बादलों से भरी बम्बई की शाम. सुमेधा ने कहा था कि शुरू में पुरूष से सम्मोहन के सहारे अपने ढंग से मनवाया जा सकता है. उसे तब उसकी बात अटपटी लगी थी. पर कमरे में कैद टुकड़ा भर आसमान को ले कर वह कसमसाने लगी थी. उसने झिझकते हुए कहा था----
"चलें बाहर कहीं?"
"इस मौसम में," वह चौंका था."व्हाट नाॅन्सेंस, बीमार पड़ोगी."
वह मेडिकल फर्म का सेल्स रिप्रेजेंटेटिव था.
"तो क्या हुआ. सर्दी बारिश तो लगी रहेगी. मौसम के हिसाब से फूंक-फूंक के जीने लगे तो जी चुके हम. जीना है तो बस जी लो. मत सोचो रात है, दिन है, पेट भरा है या खाली. बस जीते रहें......." वह जाने कैसे बोल गई थी सहसा.
वह पास आया था और उसके कंधे पर हाथ रख कर बोला था, 'मेरी जान, यह मौसम है यहीं खिड़की के पास बैठने का, चाय के साथ गरम-गरम पकौड़ियां और साथ में तुम. बाहर बसों में भीगने और साड़ी खराब करने का क्या तुक." वह जोर से हंसा था और उसे कस कर चूम लिया था. वह चुपचाप किचन में थी---- पकौड़ियां तलती और वह बाहर था---- कुछ पेपर्स के साथ. बीच- बीच में उसे वहां आने के लिए आवाज देता. पर किचन स्लैब पर कोई नहीं था.
वह पकौड़ों की तारीफ करता रहा था कि उसकी मां भी इसी तरह के पकौड़े बना दिन ती थी. उसके हाथों को चूमा था.
रात हौले से पसर गई थी. बारिश की रात. वह मनमानी करता रहा था उसकी देह के साथ. उसे लगा था कि उस रात वह लगातार मरती रही थी. देह की गठान उसने नहीं देखी थी. सिर्फ ज्वार था जो उसे रह-रह कर भिगो जाता था. पर वह भीग कहां पाई थी. सिर्फ गुजर जाता वह ज्वार उपर से. वह सिर्फ कुछ उत्तेजक अंग हो कर रह गई थी. यानी कि एक औरत, एक पत्नी.
एक सपना था जो धीरे-धीरे मरने लगा था. वह उस सपने की मौत देख रही थी.दिन जैसे बुझने लगे थे. न धूप, न अंधेरा. सब कुछ बुझा-बुझा सा था. हवा में राख जैसा कुछ तैरता. न. हवा भी तो गुम होने लगी थी. उसके इर्द-गिर्द तमाम चीजें मरने लगीं थीं. बीमार होने लगा था सब कुछ. मरी नहीं तो सिर्फ वह.
सन्नाटे में सपनों की हवा एक सिलवट छोड़ जाती थी रोज. और उन सिलवटों से भर जाता था पूरा दिन, पूरी रात.
वह चाहती थी शेखर से कहे कि एक दूसरे से कही गई सोची गई बातों से नया अर्थ मिलता है, संवेदना को, सम्बंधों को. वह सिर्फ शारीरिक नहीं होता, उससे ऊपर होता है. हम शरीर नहीं होते सिर्फ भावना होते हैं. जैसे कोई सिंफनी हवा में तैरती रहे. वह प्यार तब सिंफनी हो जाता है. एक दूसरे के होने का एहसास, एक दूसरे के लिए अपने होने का एहसास.
गोद में सिर रख कर ढेर सी बातें करना चाहती थी. धीमी आवाज में कविता गुनगुनाना चाहती थी. वह चाहती थी कि फुसफुसाती, मचलती सी आवाज में उससे बातें करे, प्यार के उन क्षणों में, जो धीमें-धीमें कहीं किसी सांझ की तरह, धीमे-धीमे सरके किसी चांदनी की तरह. वह सिर्फ प्रतीक्षा करती रही समुद्र बनते शेखर की. पर शेखर के लिए प्यार एकांत की नोच खसोट था. रात में देह की खुमारी था. प्यार दांपत्य था. एकदम दांपत्य .
  शेखर के लिए दुनिया की कोई भी वस्तु रूपयों में ही तुलती थी. खरीदी जा सकती थी. सुख- सुविधाएं , शांति, सब कुछ, वह क्षणों को रूपयों में तब्दील कर लेने पर विश्वास करता था और उसके लिए उसका घूमना, मेहनत करना जरूरी था, ताकि बुढ़ापे में एक आरामदेह जिंदगी मिल सके. भविष्य, बुढ़ापा-- वह इनकी चिंता करता था.
उसने उसे बताया था कि तमाम चीजें ऐसी हैं जो रूपयों से नहीं खरीदी जा सकतीं, जैसे हवा, चांदनी, पहाड़ी धुंध या जंगल का संगीत, या शाम के रंग.
वह हंसा था----" दिमाग तो ठिकाने है. जो चीज काम की नहीं होती, वह रूपयों से कहां खरीदी जाती है. मैडम, जब जुहू जाओ न हवा खाने तो वहां भेलपूरी खाने के पैसे देने पड़ते हैं. घुड़सवारी करनी हो या घोड़ागाड़ी पर जाना हो--- समझी--- मनोरंजन भी मुफ्त नहीं होता..... "
यशी उसे बता नहीं पाई कि यह सब वह जो महसूस करती है, मनोरंजन नहीं है. सिर्फ इतना भर कहा था उसने---
"लेकिन धुली चांदनी, शामों के रंग, झरने के संगीत और जंगल के एकांत को महसूसने वाली दृष्टि खरीद पाओगे."
पर शेखर फाइलों में डूब गया था.
"तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आती....".धीरे से बुदबुदाया था वह
वह शेखर था, उसका पति. जिसने उसे बिन्नी की शादी में पसंद किया था.जो अम्मा की नजर में अच्छा खासा लड़का था.जिसके शादी के बाजार में ऊंचे भाव थे. जो एक सफल आदर्श पति हो सकता था. एक सफल दांपत्य निभा सकता था.शेखर में खूबसूरत एहसासों को समझने की न क्षमता थी, न रूचि, न वक्त. उसके लिए संसार का अर्थ वही था जो वस्तुगत था. इससे अधिक कविता, संगीत, गैरजरूरी चीजें थीं. जिनकी कोई उपयोगिता नहीं थी.
खाली वक्त में कढ़ाई, बुनाई, क्रोशिया करना उसकी समझ में आता था. खाली वक्त महसूस करने के लिए भी होता है, यह उसकी समझ से परे था.
उसके तर्क वैज्ञानिक होते, मेडिकल होते--- एहसासों की दुनिया से उनका कोई रिश्ता नहीं होता.
विवाह के एक माह बाद ही शेखर निकल गया था लम्बे दौरे पर. फिर तो वह अक्सर निकलता रहता. वह धीरे धीरे उन दिनों को अलग करने लगी थी जब शेखर साथ नहीं होता था. वह दौरे पर निकल जाता तो उसके भीतर सब कुछ पिघलने लगता. तभी तो हुआ था. चित्र का वह शेखर सहसा निकल आया था. और वह जीने लगी थी उसके साथ. शेखर जब जाता तो अपने साथ तमाम चीजें ले जाता. एक पूरी दुनिया ही. उसके जाने के साथ ही वह हिस्सा ,जो वह उसके साथ जीती थी, खत्म हो जाता . देह से भरपूर औरत बन जाने के बाद भी भीतर की लड़की जो अछूती थी, अंगड़ाई ले कर उठ बैठती उसके दूसरे हिस्से से. जीना शुरू कर दिया था चित्र वाले शेखर के साथ. वही हिस्सा वह जीना चाहती थी. शेखर की अनुपस्थिति में वह अकेली निकलती---- नरीमन प्वाइंट, हैंगिंग गार्डेन, जाने कहां-कहां बारिश में, सिंदुरी शामों में, रात के झिलमिलाते अंधेरों में---- एक दूसरी दुनिया सिमट आई थी उसके चारों ओर. शेखर लौट आता तो सब बुझने लगता. जीने और मरने का यह सिलसिला चलता रहा. शेखर के लौटते ही भीतर की लड़की को सुला देती थी. शेखर को औरत चाहिए थी. लिहाजा यशी ने समझौता कर लिया था दो हिस्सों में बंट कर जीने से.
शेखर ने उसे अकेलेपन से मुक्ति पाने के लिए कमप्यूटर कोर्स ज्वाइन करने की सलाह दी थी, जिसे मुस्कुरा कर उसने टाल दिया था. वक्त का उपयोग होना चाहिए, यशी, यू आर स्मार्ट इनफ. उसने कहा था.
पर वह चुप रही. उन बातों को चुप्पी से झेल लेने की ताकत भी उसी दूसरे शेखर ने दी थी, यह वह जल्दी ही समझ गई थी.
पर अब. शेखर के उस पत्र ने जैसे उसे बीच सपने से झिंझोड़ कर जगा दिया था. आज की डाक से वे दो पत्र आए थे.
टेढ़े मेढ़े अक्षरों में अम्मा का पत्र--- "कैसी हो.पत्र नहीं लिखतीं. समय नहीं मिलता क्या. जमाई बाबू तो छोड़ते ही नहीं होगें. मेरी मान जल्दी से कुछ कर ले. वरना बुढ़ापे में बच्चे जनेगी क्या?"
मां भरे पूरे घर में ब्याही थी. अब अपने अवचेतन मन की कल्पना को सहला रही थी.
दूसरा पत्र शेखर का था. "एरिया मैनेजर हो गया हूं. अब भागमभाग नहीं रहेगी. दफ्तर वहीं होगा शहर में. महीने के दो तीन बाहर रहना होगा. शेष तुम्हारे साथ. खुश हो न. तुम्हारा शेखर."
वह उत्साहित नहीं हो पाई थी. कुछ टूट गया था जैसे भीतर. उसके लौट आने की आतुरता की तुलना में पत्र में झांकती उसकी अपेक्षाएं ज्यादा बेसब्री से झांक रहीं थीं. पत्र लिखने वाला शेखर उसका पति है. पर वह शेखर, जिसकी गोद में लेट कर वह कविताएं गुनगुनाती है, जिसके साथ सूर्यास्त के तमाम रंग भीतर उतारती है, वह तो गुम हो जाएगा, उस लड़की को भी अपने साथ ले कर.यथार्थ सपने को ठेल कर आगे बढ़ जाएगा.
 किसी भी निर्णय को ले लेने की जल्दी, जिंदगी को क्षण प्रति क्षण जी लेने की तेजी--- उसकी बेचैनी बढ़ने लगी. जब भी सोच की दिशा में कोई अंधी गली आ जाती है, उसकी सुगबुगाहट बढ़ जाती है.
  उसने खिड़की से बाहर झांका. परिंदे लौट चुके थे. एक हल्की सफेद परत थी, जो टुकड़ा भर आसमान में थी. उसे याद आया आज तो पूर्णिमा है, गोल चांद, पूरी माया वाला.
"ए वर्ल्ड लुक्ड एट हर स्टेट इन द आइज,
आई एम अलोन शी व्हिस्पर्ड
आई एम अलाइव-शी एंटर्ड द रूम"
उसने खिड़की बंद की और पर्दे खींच दिए. अलमारी में टंगी साड़ियों पर उंगलियां फिराने लगी. गहरी नीली साड़ी पर ढेर सफेद बुंदकियां. उसने वही साड़ी पहन ली. मोतियों के टाॅप्स, माला. वह बाहर निकल आई.
  नरीमन प्वाइंट की चट्टान पर अकेली कहां थी वह, शेखर भी तो था उसके साथ. साड़ी का आंचल लहराते हुए उसने पूछा---- "बताओ  तो , आसमान ऊपर है या नीचे."
  "यही तो मैं भी सोच रहा था, नीचे कैसे उतर आया."
        वे दोनों देर रात तक बैठे रहे.
       " घर नहीं लौटना ........" एक फुसफुसाती आवाज गूंज गई.
           " नहीं सारी रात यहीं बैठना है, जब तक रात अपनी साड़ी न उठा ले जाए."
  वह भीगती रही. रात गहराती रही.ज्वार बढ़ता रहा.वह पूरी तरह भीग गई थी.
हवा सरसरी रही थी----
"ओह, हू विल केयर टू लिव
टिल लव हैज नथिंग मोर टु आॅफर, नथिंग मोर टु गिव
आइ वांट टु डाइ....."
"लहरों के पास नहीं चलना." शेखर फुसफुसाया
"चलें? सच्ची. "वह  जैसे नींद में उठ गई थी
"चलो"
चट्टानों पर धीमे से पांव जमा वह उतरने लगी थी.
"आगे चलें"
"हूं, चलो...."उसकी आवाज भी लहरों में खो गई
वह आगे बढ़ती रही धीरे- धीरे. शेखर के हाथ में उसका हाथ था.
मैं ही समुद्र हूं, मैं ही ज्वार, मैं हवा हूं, मैं धुंध.........सहसा शेखर का हाथ छूट गया........मैं ही सूर्य हूं, मैं ही चंद्र, मैं ही रात की कालिमा हूं और मैं ही प्रातः का आलोक.............
और उस हल्के आलोक में शांत समुद्र के तट पर चट्टानों के पास रेत पर एक सिम्फनी शांत हो गई.

                     
 
 इस कहानी के विषय में बहुत कुछ कहने का मन कर रहा है, पर कुछ नहीं कहेंगे। कुछ चीजों का जादू कहने, बोलने से टूट जाता है. वे धुंध की रेशमी तहों में लिपटी ही मन के ज्यादा करीब लगती हैं.
यह कहानी, डा. सुमति अय्यर के जाने के बाद प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ''विरल राग'' की अन्तिम कहानी है. उनकी अन्तिम प्रकाशित रचना। इसके बाद यदि किसी भी पत्र-पत्रिका में उनकी कोई रचना प्रकाशित भी हुई है, तो वह उसका पुनः प्रकाशन ही होगा और सच, यह अन्तिम रचना ही होनी चाहिए, क्यों कि उसके बाद तो.……  सिम्फनी खो गई.






Monday, November 5, 2012

टटोलती रहीं तुम्हारी आंखें
मेरे चेहरे को
ढूंढती रहीं
शायद वह
जो तुम पढना चाहते थे
या कि
जो सचमुच मैं कहना चाहती थी
पता नहीं
क्या मिला तुम्हें अक्सर
वह जो तुमने चाहा पाना
या कि वह जो मैंने कहना
पर सच है
जब भी तुमने टटोला
मैं चिड़िया हो गयी चहचहाती
मेंह हो गयी आकार बदलती
अमलतास हो गयी हंसी बिखेरती
पलाश हो गयी आंच बांटती
हरसिंगार हो गयी शांत झरती
बसंत शरद हो गयी
पर नहीं हुयी सिर्फ़ चेहरा
तुम्हें भी तो नहीं मिला होगा
कोई चेहरा
मिला होता तो
तुम भी हो जाते चेहरा
तमाम चेहरों के बीच
एक चेहरा
पर
तुम आकाश हुये समेटते
समुद्र हुये डुबोते
बारिश हुये भिगोते
पहाड़ हुये मुग्ध करते
छतनार हुये सुरक्षा देते

तुम चेहरा नहीं हुये
इसीलिये तो
मैं मेंह बनी
मछली बनी
बारिश की बूंद बनी
पहाड़ की बर्फ़ बनी
छतनार की खुशबू हुई
नहीं हुई सिर्फ़ चेहरा
हम हम हैं
कि चेहरा नहीं हैं
सर्वनाम नहीं हैं......

और आज के ही दिन तुम सारी गणित,सारी व्याकरण ,सारी परिभाषाओं और पहचान से परे बारिश,पहाड़,मेह,खुशबू हो गयी थीं.और हमने भी संजो रखा है तुम्हें पहली बारिश मे उठती माटी की सोंधी गंध में,अलस सुबह झरते हरसिंगार के रंग में,दूर पहाड़ों पर गूंजते लोक गीतों के बोलों में.......यहीं हो आस पास.

Saturday, March 10, 2012

 'लयबद्ध 'डा. लक्ष्मी कन्नन ' के तमिल कहानी संग्रह का डा. सुमति अय्यर द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद है.इस कहानी संग्रह में पंद्रह कहानियाँ है ,जिसमे से हम आख़िरी कहानी 'लयबद्ध' ही फिलहाल यहाँ उतार रहे हैं.




बोल्ड आखिर है क्या ?क्या वह जीवन का यथार्थ है ?जिधर देखो कहानियाँ -कहानियाँ बिखरी पडी है जीवन के यथार्थ रंगों से परिपूर्ण .आपकी पकड़ से शायद कई रंग छूट गए हो .किन्तु कहानी में वे पूर्ण रूप से उजागर हो उठाते है ,ठीक फोटो चित्र की तरह और यदि इन चित्रों को समय और समाज मान्यता देता है तो वे लेखक और पाठक दोनों के लिए कालजयी बन जाते है .
ये रहा  पद्मा के सामने स्तूप की तरह बैठा बिल . सुद्रढ़ शरीर और ठहरी आवाज वाला बिल परछाई की तरह न जाने कहाँ बिला गया .अत्तेत के गर्त में समा गया ! जीवन की परिधि के बाहर चला गया !किन्तु इस कहानी से नहीं .इस कहानी में आज भी वह अडिग बैठा है ,देवदार वृक्ष की भांति ,लंबा छरहरा बदन और व्यक्तित्व जैसी ही सुदृढ़ आवाज .कुछ समय के लिए पद्मा के जीवन में यथार्थ बन कर आया था और आज स्वप्न की भाँती विलीन हो गया है .उस दिन केलिफोर्निया के बर्कले विश्वविद्यालय में उसने 'कथा साहित्य ' पर लंबा जोरदार भाषण दिया था .उसके अनुसार पीड़ा ,अविश्वास और तनाव की अनुभूति में कथा को रूप मिलता है .अपने में अनुभवों को समेटता हुआ एक भ्रामक बिम्ब .अगर कहानी सही ढंग से लिखी गयी हो तो उसे पद लेने के बाद कथा की तरह जीवन के व्यतीत होने की जैसी अनुभूति होती है .इतना बोलता रहा की खाना तक भूल गया .छोटे से कप में मक्खन पत्थर की तरह जम गया था .काफी वे पहले ही पी चुके थे .कुछ कप बिखरे हुए पड़े थे .केलिफोर्निया में इन दिनों खूब ठंडा रहता है .शीशे के पार कोहरा फूलो की तरह फैला था .सर्दी से कांपती हुई पद्मा उठी .
" बिल एक काफी और हो जाय?"
बिल ने सर नीचे हिला कर हाँ कर दी .पद्मा उठ कर दो प्याले और ले आयी और आ कर उसके सामने बैठ गयी .चीनी और दूध से रहित काली काफी .कडुवाहट अब आदत बन गयी थी ; गले के नीचे आराम से उतर जाती है.पद्मा के बैठते ही बिल ने फिर से सिरा जोड़ लिया .
" यह जो 'ब्लैक इल्क ' नाम के आदिवासी हैं न ,उसकी जीवनी पढो तो तुम्हे पता लगे कि कहानी किसे कहते हैं ?एकदम साफ़ सुथरी शैली है .जरूर पढ़ना ."
" देखो बिल ,अमेरिकी आदिवासी की जीवनी का मेरे शोध कार्य से कुछ लेना देना नहीं है ,तो फिर मै क्यूं पढू ? मेरे पास फालतू वक्त तो है नहीं ." पद्मा ने टोक दिया .
" तुम्हे अब सम्बन्ध भी ढूढने होगे पद्मा ! देखो सम्बन्ध तो अपने आप होते है .किसी दबाव के तहत तो होते नहीं .तुम्हारी दृष्टी इतनी छोटी हो गयी ."
" अरे बाबा ,ठीक है .मैं पड़ती हूँ .अब बताओ ,तुम क्या कह रह थे ."
" उसमे ब्लैक इल्क के पिता,जिनका जिक्र काले हिरन के नाम से किया गया है ,के विषय में बताया गया है .लिखता है ,"बुढापा प्रत्येक मनुष्य को आता है .बाबा को भी बुढापे ने ठीक इस कोहरे की बर्फ की तरह धक् लिया था .फिर वे दुखी क्यों होते थे ."जीवन मरण के यथार्थ को वे सहज ढंग से लेते रहे और जीते रहे है .बस ,उन्ही की तरह काला हिरन भी जीता रहा और फिर समाप्त हो गया .पहाड़ की तहलटी में उसे दफना दिया गया और फिर कुछ दिन बाद वहा घास उग आयी इस कहानी में हम अपने को ढूढ़ सकते हैं ."
" लगता है तुम्हारी कहानी गढ़ने की आदत कभी छूटेगी नहीं ." पद्मा ने काफी की चुस्की ली .
" हाँ पद्मा ,लोग बार बार एक ही कहानी को तोड़ते -मरोड़ते रहते हैं कथा का इतिहास बहुत पुराना है "नियंदरथल " नाम के हम आदि बानर की बात कहते है ,उसके समय से ही कथा का प्रचलन प्रारम्भ हो गया था ."
"नियंदरथल के पास तो भाषा ही नहीं थी ,फिर कथा को रूप कैसे मिला ?" पद्मा ने आश्चर्य से पूछा 
" दीवारों में ,चट्टानों में ,उसने उकेर कर सपने की तरह बीत जाने वाले जीवन की घटनाओं को रूप दिया ."
पद्मा उसकी बांटे सुनाती हुई बाहर फैले कोहरे को देखती रही .बिल आगे कहता रहा ," पता है उस नियंदार्थल मानव ने ही अपने समय के जंगली जानवरों को .शिकार को ,दो पैरों वाले मानव नाम की वस्तुओं  की अनित्यता को ,फिसलती हुई जिन्दगी को अपने ढंग से रोक रखने की कोशिश की थी ."
"जिन्दगी क्या है ?  कहानी क्या है ?नाखून और चमड़ी में क्या भेद है ?दोनों का ताना बाना स्वप्न की तरह होता है उस स्वप्न में से ही हम सचेत हो सकते है .पर स्वप्न तो सुषुप्ता अवस्था में ही देखे जा सकते हैं न !सब जैसे घूम घूम कर स्वप्न की और ही ले जाते हैं ,शेक्सपीयर ने यही तो कहा है .औए उसी पीड़ा को हम पूर्ण परिपक्वता से गृहण करते हैं और पचाते हैं."पद्मा ने खिड़की से आँख हटाई और बिल को देख कर बोली ," अंत में नियंदार्थल के उस मानव ने भी तो पृकृति के प्रभाव को किसी तरह रोक कर रख लिया था ,अपने सहज ढंग में .तभी तो हमें आज भी ऐसे चित्र मिलते है जो उसकी कथा कहते है ."
बिल ठाहाका लगा कर हंस दिया.उसकी भूरी आँखों में शरारत चमक उठी .
" मैंने तो जानबूझ कर इस शब्द का प्रयोग किया था .शायद तुम ऐसी ही भाषा समझ सको, क्यों?"
उसने हंस कर पद्मा के कंधे थपथपा दिए और बोला ,"आओ ,चले."
पद्मा सकुचा गयी . कैसी बेवकूफी कर गयी वह .इन्ही शब्दों पर'रोक कर रख लेने 'पर ही तो उनका परिचय हुआ था .तब भी बिल ने ऐसी ही शरारत की थी
बिल का असली नाम है डा. विलियम हेक्स्रन ,पर सब उसे बिल ही कहते है .वह भी केलीफोर्निया के बर्कले विश्वविद्यालय में शोध करने आया था .पद्मा की ही तरह उसे भी केलीफोर्निया जिले के एनी विश्वविद्यालयों ,लास एंजेलस ,सेंफ्रैन्सिसको ,इर्वाइन जाना था.उनकी पहली भेंट की याद आते ही पद्मा को आज भी हंसी आ जाती है .उस दिन सुबह का काम ख़त्म कर पद्मा बाहर टहल रही थी .इमारत के सामने लंबा चौकोर पोखर है .पद्मा उसके किनारे चल रही थी की बिल जो उसके पीछे चल रहा था लपक कर पास आया और बोला ," हेलो ,मैं पिछले कई लेक्चर्स से देख रहा हूम की तुम सर झुकाए लिखती चली जाती हो .भाई ,उसमे ऐसा लिखने जैसा है क्या ?"
बिल के यूं अचानक आ जाने और उसके इस अप्रत्याशित सवाल से वह चौंक गयी .पहले कभी औपचारिक परिचय हुआ था .वे कभी कभी अचानक हाथ मिला कर एक आध बोल लिया करते थे पर आज अचानक यूं ....
"प्रोफ़ेसर कोइ ऐसी बात कह देते हैं ,जो शायद बाद में दिमाग से निकल जाय ,उसी को रोक कर रखने के लिए .नोट कर लेती हूँ ."
" अच्छा !तो  यह बात है .तो एक कम करते है .लंच में मैं तुम्हे कैम्पस में स्तिथ इलेक्ट्रोनिक्स की दुकान पर ले चलता हूँ .वहां एक छोटा टेप रिकोर्दर मिल जायेगा उसे खरीद कर रख लो .पर पहले प्रोफ़ेसर की अनुमति ले लो फिर पूरा भाषण टेप कर लेना फिर आराम से कमरे में बैठ कर जिसे तुम चाहती हो रोक कर रख सकती हो ." अंतिम वाक्य पर उसने जोर दिया और उसकी और देखा
’ओह ,बिल ,थैन्क्यु, !थैंक्यू ,वेरी मच!"
" नो प्रोब्लम."
फ़िर उनकी मैत्री स्थायी हो गयी.बिल इस लगाव के बारे में बार बार सोचता और उसने पद्मा से एक दिन पूंछ ही डाला.
" हे भग्वान ,ये भारतीय किसी भी निर्णय पर पहुंचने के पहले दस बार सोचते हैं.अच्छा तो चलो,यदि तुम चाहो तो मैं अपने और तुम्हारे इस रहस्यमय लगाव पर कुछ शोध करूं? एक आध उत्तर ढूंढ दूं?"
" छोड़ो भी,मुझे तुम्हारे उत्तर नहीं चाहिये.अता पता करने की जरूरत नहीं." पद्मा खीज उठी थी.
" हां,हां,अब तो यही कहोगी.फ़िर भी सुन लो. यह एक संयोग है.आलस्मिक घटना है,जो मेरे साथ घटी.वैसी इस बारे में हम आगे बात नहीं करेंगे.पहली बात मैं कार्य के मामले में कुछ अलग हूं.मतलब लेखन मेम रुचि रखता हूं.लेखन का मतलब कहानी ,कविता नहीं.सोच समझ कर आम विषयों पर लिखना.इसी सिलसिले में एक बार भारत भी गया था.’अमेरिका रिव्यू नाम की पत्रिका ने पाकिस्तान,बांगला देश,भारत की युद्ध सम्बन्धी कार्यवाहियों की रिपोर्टिंगकरने के लिये जिस दल के साथ भेजा था,उन्हीं के साथ मुझे भी ढाका,इस्लामाबाद और भारत जाने का मौका मिला था.मुझे लगता है भारतीय बड़े गम्भीर होते हैं" उसकी भूरी आंखो में फ़िर वही शरारत.
" तुम कहना क्या चाहते हो?यही कि मैं आम भारतीयों से कुछ अलग हूं ,यही न,क्यों" पद्मा ने पूछा.
"अरे नहीं. बात को बाच में मत टोको.प्लीज!दूसरा कारण हमारे लगाव का क्या हो सकता है ,पता? यह तुम्हारी जिग्यासा को तीव्र कर दे और तुम्हारे लिये समय काटने का अच्छा साधन बन जाय."
" क्या?"
" सुना है,मेरे पूरवजों में कुछ सिकानो रह चुके हैं"
" सिकानो? यह क्या बला है?"
" वह एक किस्म का वर्णसंकर वंश  है.’ अमेगिल’ पुरातन अमेरिकी भारतीयों का वंश.अर्थात जिन्हें पहले रेड इन्डियन कहा करते थे.उनका वंश कुछ विस्तार में कहूं तो,नीग्रो में ’भुलाटो’नाम की जो वर्णसंकर जाति है,जिनका रंग साफ़,होंठ पतले और बाल सीधे होते हैं,ठीक उसी तरह मैं भी "अमेर अण्डियन" हूं."
पद्मा हंस पडी .रंग तो साफ़ है .पर उसके बाल, उसकी नुकीली दाढी का गहरा रूप -रंग ,लम्बी नाक ,बड़ी आँखे और गठा हुआ बदन ,उसे लगा जैसे उसने उसे पहली बार देखा हो .बिल उसकी आकलन भरी दृष्टी पर ठाहाका मार कर हंस पड़ा .
" क्या हुआ ,मैं परिक्षा में पास हो गया ?देखा ,मैंने घुमा -फिरा कर कैसे साबित कर दिया की मैं भी भारतीय हूँ .अच्छा ,तो अब मुझे स्वीकार करोगी?
बिल जब इस तरह हंसता है तो उसकी आँखों के कोनो में लकीरे उभर आती है.उसकी भूरी आँखों की शरारत के पीछे भी कुछ था जिन्हें उसकी आँखे खोज रही थी .दृष्टी में जैसे कोइ याचना भर आती थी .
किस तरह उसने अपने मूल रूप की चर्चा करते हुए एक प्रमाण पात्र सा थमा दिया था .पद्मा इसी स्तिथि से तो घबरा कर भागती आ रही थी .पर नहीं भाग सकी .बिल से जब परिचय हुआ ही था ....ओह ,कितना भागना पडा था .पर इस दौड़ के पीछे और भी कई कारण है .बिल यानी विलियम हेक्सटन से वह जब पहली बार मिली थी तो उसके रूप नहीं उसकी बुद्धी से प्रभावित हुई थी .कितना प्रतिभाशाली व्यक्तित्व !दूसरो की बुद्धि की थाह लेती हुयी गहरी भूरी आँखे .बातो का पैनापन ! ठीक किसी जौहरी की तरह ,जो हीरे को ध्यान से परख कर दोषी हीरे को हटा देता है .उसकी बातो का वही दो टूक पन,परखने के उसी अंदाज से प्रभावित हुयी थी पद्मा .कभी कभी तो पद्मा को अपने बुद्धि बल पर से विशवास हट जाता .सोचती ,उसका और बिल का कोइ जोड़ नहीं है और वह दूसरो की तरह भागने लगी थी .पर बिल ने उसे छोड़ा नहीं .भूरी आँखों ने ढेरो आग्रह किये .आँखों में ढेरो प्रश्न लिए वह लगातार उसके आगे पीछे भागता रहता .मानो,उससे हर प्रश्न का उत्तर चाहता हो .हांलाकि दोनों उम्र के उस दौर को पार कर चुके थे जन्हा आँखों में ढेरो सपने उग आते है .खुली आँखों से यथार्थ पहचान लेने की उम्र में आ गए थे वे .तलवार की धार वाली उम्र ,जहां भावनाए ,मनोवेग ,विचार ,जीवन के यथार्थ से उजागर रहते ठीक शरीर में गुदे गोदने की तरह ,अमिट और चुभन भरे .और सब कुछ जान लेने के बावजूद पीड़ा को नकारा नहीं जा सकता
पद्मा सिन्दूर वृक्ष के बीज को हथेलियों में घुमाती रही .पेड़ के नीचे कुछ बीज छितरे पड़े थे .कांटे की सी चुभन .बिल के वाक्यों में उसकी साँसों की गरमी घुल गयी थी .
" तुम हर बात पर परम्परा की दुहाई देने लगती हो .क्यों, क्या मेरे पास अपनी परम्पराए नहीं है .पर मै उनकी बैशाखी बना कर लंगडाना नहीं चाहता.जीवन के अनुभवों के लिए खुद को खुला रखूगा.हाँ ,तुम जिस परम्परा की बात कर रही हो ,वह आखिर है क्या ?" उसने पूछा .
  " एक संस्कार ,कुछ परम्पराएं ,जो जीवन को स्थायित्व प्रदान करती हैं ,जो अमिट हैं ,शाश्वत हैं ."
" धत्तेरे की ! शाश्वत ... वगैरह वगैरह .मैं तो जानता था ,तुम यही कहोगी  .पहले बताओ की शाश्वत है कौन? मैं ,तुम ?जब हम एक -एक दिन जीवन को दांव पर लगा कर जी रहे है ,तो यह कैसी विडम्बना ?पद्मा ,किसी भी वर्त्तमान को जी लेने की थोड़ी सी भी चाह नहीं होती तुम्हे ?मैं भी सोचता हूँ की जिन शब्दों का प्रयोग करने से तुम्हारा समाज अलंकृत हो ,वही करो ?"
यही बात इरविन में भी चलाती रही .
" प्लीज, इस बात को आगे मत बढ़ाओ."  पद्मा ने कहा .
" तो छोडो .फिलहाल नहीं करते ! तुम अब मेरे साथ चलो .हम पेसिफिक सागर तक हो आते है ." भारी चर्चाओं को धुल की तरह झाड कर ,वह फिर आत्मीयता से प्रस्तुत हो गया था .
" मै भी तुम्हारे साथ चलूंगी ? पर तैरने नहीं आउगी."
" क्यों ? क्या हुआ अब ?सुना है अकेले में होस्टल पूल में घंटो तेरा करती थी तुम ."
" सच है,पर अब आज शाम को आलस आ रहा है .लगता है बस सागर किनारे टहल आया जाय ."
एक क्षण बिल उसे घूरता रहा .फिर एक हाथ से सर थाम कर बोला ," ओ god ,ये भारतीय लड़किया इतना क्यों लजाती हैं ? क्या यह भी कोइ पारंपरिक गुण है ?"
उत्तर में उसे मिली बस एक शिथिल मुस्कराहट .
पैसिफिक सागर मद्रास के समुद्र से बिलकुल अलग था .मद्रास में सागर का पानी हरा और नीला लगता था . उसकी लहरों में आक्रोश और एहसास होता था .पर यहाँ ,सागर गहरे नीले रंग में शांत बिछा हुआ था .लहरें आराम से तट तक आ कर लौटती .नीले रंग का सर्द सन्नाटा .बिल लगातार आधे घंटे से  कुछ लोगो के बीच तैर रहा था .पद्मा को उस पर तरस आ गया .तरस तो उसे अपने पर भी आया .बेचारा ,कितना प्रयास कर रहा था की अपने साथ पद्मा को भी खींच कर ला सके .
" तुम्हे क्या हो गया है पद्मा !"वह फट पडा . हम लोगो के बीच जाती की दीवार नहीं .बस वही पुराना भय .क्या जिसे अनित्य और घृणित का लेबल लगाती हो ,वही तुम्हारा पुराना भय है .?"
" बिल , मैं..."
" स्टाप इट, तुम अब फालतू बांते करोगी .तुम मेरी सहनशीलता को हद से अधिक छेड़ रही हो .हो सकता है ,तुम्हारे जीवन में हमारा परिचय एक सार्थक घटना बन कर रह जाय.इसे तुम भूल भी सकती हो ,हो सकता है इसकी याद बनी भी रह जाय .हो सकता है ,कुछ दूर चलने के बाद हमारे सम्बन्ध समाप्त  भी हो जाय . तुम तो विधि और कर्म पर विश्वास करने वाले ' गीता' के देश से आयी हो ,जीवन जो संयोग और संभावनाओं से भरा है ,विलक्षण मायावी रहस्यों से भरे जीवन के बारे में तुम्हारा अनुमान इतना सपाट और सीधा हो सकता है ? पर यह लेबल लगा कर बच कर चलने का मुक्त बोध !वह भी तुम्हारी जैसी लड़की का ,बस इसी से मुझे चिढ है ."
पद्मा उसकी आँखों में देख नहीं पायी .पर उसका विवेक जैसे पिंजड़े से छूटे कबूतर सा उड़ा और बिल के विवेक झुण्ड में जा मिला तौलिया ले कर बिल पानी की ओर फिर चल दिया .पद्मा तट पर पडी जूट की कुर्सी पर बैठी उसे जाते देखती रही
" मैं बूढ़ी हो गयी हूँ .सच , युवा हो कर भी बूढ़ी .बूढों को तैयार करना तो कोइ हमारे देश से सीखे .जीवन के उतार चढ़ावों के अनुभवों को झेलने में अशक्त हो ,यूं ही तट पर मूक दर्शक बने हम केवल बैठ सकते हैं ? वही पुराणी घिसी पीती बांते .विवशता .'सतीत्व ''परम्परा' जैसी थोथी बांतो ने कितना बौना कर रखा है .इसी के नाम की दुहाई दे कर दूसरो को दुखी करना ,भीतर की सच्चाइयों को नकारना और उसके बदले ..साथ चलने वाला यह लगातार सूनापन ,अपने ऊपर आने वाली खीज ." पद्मा का मन खट्टा हो गया .परम्परा को बनाए रखने वाले इस क्षण ने जैसे उसे उसके अकेलेपन से और भी परिचित करा दिया ,'सतीत्व 'के नाम पर कोढ़ी की तरह अलग रहा जा सकता है .हमारा देश अकेलेपन के महत्त्व को मानता है .धर्मराज के अकेले स्वर्गारोहण को उनकी विजय मानता है .वहां ऐसी संभावनाए बिलकुल उत्पन्न ही नहीं होतीं .गृहस्थी दो बैलों की गाडी की तरह जीवन के दुःख दर्द से परे बस एक ढर्रे पर घिसटती रहती है .
और यह पैसिफिक सागर को देखती हुई पद्मा कृष्णामूर्ति नाम की लड़की अपने देश ,अपना काम ख़त्म कर ,अपने नाम के साथ लौटेगी .उसी चिडचिडे ,दुर्वाशा पिटा के खोखे में .मांवालम में स्थित घर जहां पिछवाड़े केले के वृक्ष ,बगल में नारियल के लम्बे तने वाले पेड़ ,आगे बेला ,जूही ,चमेली के झाड हैं .वह ,उसी घर में जहां सब कुछ एक सनातन परिपाटी से होता रहता है ,लौट जायेगी .धर्मराज का सम्मान करने वाला समाज उसकी आरती उतार कर कहेगा कि बेटी तू धन्य है जो सात समुद्र पार जा कर भी शुद्ध रही सारे अनित्य परिचयों की धुल उतरवाई जायेगी और स्थायी अंशों से उसका परिचय करवाया जाएगा .घर ,काम ,विवाह ,बैंक ,काज ,सांभर ,व्रत विधान आदि .और जिन्दगी ढर्रे पर निकल पड़ेगी .पद्मा को लगा उसके शरीर और मन में न जाने कितनी खिन्नता भर गयी है .नैतिक कोढ़ का सहारा ले कर वह यूं सूखे तट पर अकेली बैठी रह सकती है .अंत तक धर्म ,सतीत्व की रक्षा करते हुए चिता तक भी जा सकती है .और तभ भी शायद यह सोच कर की इस शरीर में कही अहम् शेष तो नहीं रह गया उसे यूं बेरहमी से अर्थी से बाँध कर ले जाते है .
पद्मा सागर को देखती रही .'सीगल ' पक्षी आराम से सतह पर उतर रहे थे .पानी में मछलियों को ढूढ़ निकालते और उन्हें चोंच में भर कर फिर उड़ान भरते .गहरे स्याह समुद्र की सतह पर सफ़ेद 'स्व्व्गल' फूल की तरह उतर रहे थे .
जान बैज ने इन्ही के लिए तो कहा था
" नीचे उतरते है ,
लड़खड़ाते हैं ,
फिर संभल कर भरते हैं ,ऊंची ऊंची उड़ान ."

चार तारों वाले गिटार को छेड़ती और भूरे चहरे पर अजीब सी चमक लिए गाती .उसके उतरते चढते लोकगीतों में 'सीगल' है .वे प्यार और दुःख की मिलन और विछोह की बेल बुनते .उसके एकांत को बाँटते ,फिर सहसा अलग हो कर आकाश में उड़ जाते .
" क्या सोच रही हो पद्मा ?"
बिल कपडे बदल चुका था .
" तुम कब आये ? तैर चुके? पानी कैसा था ?"
" एकदम खारा .............फिर अगर खारा न हो तो समुद्र कैसा ? पर अगर तुमने अपना कभी नमक गलाया हो तब न तुम्हे पता चले .तुम तो चट्टान रही हो ."
श्री रामकृष्ण की नमक वाली उपमा यह कैसे जानता है ?शायद सिकानो भारतीय विलियम हेक्सतन की संस्कृति में यह बिम्ब कही रहा हो .'नमक शब्द के कितने अर्थ हैं ----हिन्दुओं के लिए ,ईसाईयों के लिए ,शांत जल में जैसे कंकड़ फैंक दिया गया हो और फिर पानी सहसा अशांत हो गया हो .और यहाँ इसने जो नमक का टुकड़ा फैंका है ,वह?
पद्मा का गला रुंध गया .बिल को देख कर बोली ,"बिल, तुम सचमुच मुझसे कहीं अधिक भारतीय हो .मैं सच कह रही हूँ ."बिल उसके पास बैठ गया और उसकी हथेलियों को अपने हाथों में ले लिया .उसे ही एकटक देखता रहा उसकी भूरी आँखों में अब दया भाव उतर आया था .उसकी आँखों में पद्मा को सागर का अथाह विस्तार और उस पर उड़ती सीगलों का प्रतिबिम्ब नज़र आया .उसने सर घुमा कर सागर को देखा .एक अकेला पक्षी ,स्याह जल को छू कर फिर आकाश में जैसे किसी अकेले ग्रह के आकर्षण में बंधा लयबद्ध अकेला घूम रहा था .लगातार.





 

 














Tuesday, January 17, 2012

इस कविता को पोस्ट तो करना चाह रहे थे ३१ दिसम्बर की शाम पर बस साल की वह आखिरी शाम वाकई कुछ चुप चाप सरक गयी और सुबह तब्दील हुई तो गीली गीली ठिठुरती सी और फिर इस कविता को पोस्ट करना टलता गया पर जैसे हर काम को  अंजाम देने का एक समय होता है वैसे ही शायद हर काम के टालते जाने का भी एक निश्चित समय होता है .....तो आज शायद टलने  का समय समाप्त और अंजाम देने का समय आ गया है इसीलिये कविता आज पोस्ट हो रही है .
कविता के विषय में हम कुछ नहीं कहेगे ,आप खुद ही पढ़ देखिये......

औरत होती लड़की 



कितना गुपचुप बीत जाता है 
साल का अंतिम दिन 
औरत होती लड़की के लिए .
अल्लसुबह नल की आवाज पर 
हथेलिया देख कर उठने से ले कर 
रात आँखों से निकल कर 
खिड़की से बाहर  तैर जाते सपनों 
तक
वह लड़की सिर्फ बीतती है 
साल नहीं बीतता उसके लिए .
पर वह भ्रम पाल लेती है 
औरो को देख कर 
कि साल का यह अंतिम दिन
किसी नटखट बच्चे की तरह  
उससे  अच्छे और खुशहाल दिन 
हथेलियों में लुका कर लाया है .
नहीं बीतेगा उसका यह साल 
चावल दाल बीनते 
गीली लकडिया सुलगाते 
आँगन में कपडे सुखाते
सब्जी में नमक का अनुपात  साधते 
भाइयों के टिफिन सजाते 
मा के घुटनों में मालिश करते 


वह नटखट बच्चा
हथेलियों में लुका लाया है 
भगौने से जली उँगलियों के लिए 
ढेरो मेंहदी ,
वह बच्चा लाया है ,
रूखे बालो के लिए खुशबू वाला तेल ,
महकता साबुन ,सितारों वाला  लाल लंहगा,
बिवाइयों वाले पैरो के लिए 
महावर और चांदी की पायजेब 
वह बेवजह चक्कर नहीं काटेगी
चौके से बैठक और बैठक से आँगन तक ,
वह बच्चा उसके लिए लाया है 
घोड़े पर बैठा राजकुमार 
जो उसे इस सीलन भरे मकान  से 
ले जायेगा ,एक गोल दुनिया दिखाने.
वह मुस्कुराती है सोच कर 
आईने में अक्श देखती है 
मुस्करा कर शुरू करती है 
साल का पहला दिन 


गोल रोटिया सेकती है 
बापू की मनपसंद सब्जी बनाती है 
कहानियां सुनाती है 
भाइयों को 
चाय के साथ पकौड़िया खिलाती है
मेहमानों को ,
वह प्रतीक्षा में है ,
वह नटखट बच्चा कुछ देर 
सताने के बाद खुशहाल दिन 
खोल देगा .
उसे उसके खुशहाल दिन दे देगा .


बीतते हैं दिन 
बीतती है लड़की 
मुट्ठियाँ नहीं खोलता 
वह नटखट बच्चा 
लम्बी प्रतीक्षा के बाद 
बंद होता है गुनगुनाना 
ख़त्म होता है मुस्कुराना 
और 
वह अल्हड लड़की .
सोचने लगती है 
अगर सचमुच लाया है 
मेंहदी ,महावर ,पायजेब ,
लाल लहंगा ,घोड़े पर बैठा राजकुमार 
तो सचमुच नटखट है 
वह बच्चा 
गलत चीज लाया है 
इस बार भी 
उसे तो लाना चाहिए था 
बापू की रुकी हुई वेतन वृद्धि 
भाइयों के लिए कपडे लत्ते और खिलौने 
माँ के लिए अच्छी दवाई ...

फिर एक बार 
औरत होने लगती है लड़की 
साल के अंतिम क्षण तक के लिए. 






सुमति जी ने यह कविता अस्सी के दशक की समाप्ती पर लिखी थी शायद ,तबसे उस लड़की की हांथो की लकीरों में ,सपनों के रंगों में कुछ फर्क आया है ? शायद ....शायद ,आँगन से चौके तक के चक्कर ,आँगन से चौके और चौके से दफ्तर और बाज़ार तक में तब्दील हो गये  है .कुछ के हांथो में बस का हैंडल तो कुछ के हांथो में कार का स्टीयरिंग आ गया है पर इंतज़ार............. 



 {picture © sunder iyer}
















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Friday, November 18, 2011

एक कहानी -घटनाचक्र

हिंदी कहानी का मध्यान्तर’ सम्पादक रमेश बक्षी,इस संग्रह में ३६ कहानियां हैं--समय के क्रमानुसार,पहली कहानी क्रिष्ण बलदेव वैद की और आखिरी सुमति अय्यर की.इस संग्रह का प्रथम संस्करण १९८५ में प्रकाशित हुआ था.


सुमति अय्यर की कहानी”घटनाचक्र’ में जीवन की विसंगतिया,आदमी का खुद से संघर्ष,आदमी को मजबूर करता उसका स्वार्थ सब बहुत सहज रूप से बहता मिलता है पर हमे जो बात सबसे अच्छी लगी ,वह है नायिका का जीवन को लेने का तरीका.इतनी सारी विभत्स सच्चाईयों के बीच जूझती हुई भी वह दूब के कुछ तिनके उगा ही लेती है ,सांस लेने के लिये.


खुद ही पढ देखिये यह कहानी............


                                                             घटनाचक्र




सुबह खिले काफ़ी देर हो चुकी थी.पर वह लिहाफ़ को गले तक खींच कर पड़ी थी.रामी ने दो बार दर्वाजे को हल्के से खोल कर भीतर झांक लिया था.वह कनखियों से उसे देख कर करवट बदल कर लेट गयी थी.ऊपर पंखा घर्र घर्र करता हुआ चल रहा था.कई बार उसकी ओर ताकते -ताकते उसकी इच्छा होती है,पंखा चलते-चलते अचानक छत से छूट कर नीचे आ गिरे,ठीक उसके ऊपर.उसकी कुचली लाश कैसी लगेगी फ़िर? अपनी क्रूर इच्छा पर खुद सिहर उठती है.पर ऐसा सोचने से खुद को रोक नहीं पाती.
       इस कमरे के साथ जुड़े हुये एयर कन्डीशन्ड कमरे मे सोना उसे कभी अच्छा नहीं लगा.कई बार वे इसकीइस हरकत पर झुंझला उठते हैं.पर वह है कि सुधरना ही नहीं चाहती.पंखे की घरघराहट उसे पसंद है .वे उसे बदल कर दूसरा पंखा लगवाने को कई बार कह चुके हैं,पर वह टाल जाती है.
" इसके नीचे सोते हुये कई बार लगता है जैसे अपने कमरे में होंऊ."
" दूसरे कमरे मे क्या आफ़त है?" वे पूछते
" वह कमरा घर का नहीं,किसी फ़ाइव स्टार होटेल का सूट लगता है."
उसकी इस दलील के सामने वे हार कर चुप हो जाते.
अक्सर उसे लेटे लेटे याद आता है अपने छोटे से घर का कमरा,जिसमे पंखे के नीचे सोने के लिये भाई बहनो मे गुथम्गुत्थी होती.अब वह अकेले पंखे के नीचे लेट कर अशांत रहती है.पता नहीं क्यों पंखे की हवा बेमानी लगती है.
उसका सारा शरीर पसीने से तरबतर रहता हैऔर वह निष्चेष्ट पड़ी रहती है.कोई हरकत नहीं होती.शायद दो साल पहले इस बात पर खीझ कर सारा घर सर पर उठा लेती,पर अब खीझना जैसे भूल गयी है.
रामी चाय का प्याला लिये कमरे में आ गयी है,’कल रात फ़ोन आया था.शाम पांच बजे की फ़्लाइट से .आप सो रही थी.’ पर वह चुपचाप पड़ी सुनती रही.रामी ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा.उसने शायद सोचा हो,खबर सुनते ही,वह हुलस कर उठेगी और सवाल पर सवालों की झड़ी लगा देगी.पर उसने पास ही मेज पर रखे प्याले को चुपचाप उठा लिया और सारी व्यग्रता चुस्कियों में पीने लगी.
’क्या हुआ मेम साहब तबियत तो ठीक है न!’रामी के स्वर में आत्मीयता से अधिक यान्त्रिकता थी.उसे खीझ हो आयी.सब उसके उसके व्यवहार की असमान्यता का कारण उसकी शारीरिक अवस्था में क्यों खोजने लगे हैं? उसका मन मानो कुछ भी नहीं है.उसने जवाब नहीं दिया और चुपचाप लेट गयी.रामी ने पास आ कर प्याला उठा लिया और धीरे से पूछा,’जी मितला रहा हो तो कुछ ला दूं?’
’नहीं’ उसने अनमने मन से जवाब दिया और आंखें मूंद ली.
कितना अजीब लगता है,वह इन दिनों को अकेले पड़े पड़े काट रही है .जो उसके क्या किसी भी लड़्की के जीवन में बहुत मायने रखते हैं. अपने शरीर पर होने वाली मामूली से मामूली हरकत जैसे शरीर को झुरझुरी से सहलाती हुई गुजर जाती है.मानस-पटल पर उभरते धुंधले बिम्बों को आकार देने वाले वे क्षण !उसे कितनी यादें आती हैं मां की.वह पास होती तो वह उनकी गोद में सिर छिपा कर लेटती और अपने इन अंतरंग क्षणों की हर धड़कन को उनसे बांटती.


  उसने मां को अग्रिम सूचना के तौर पर पत्र लिखना चाहा था,पर लिखते लिखते जैसे हाथ रुक गये.और उसने कागज़ के टुकड़े टुकड़े कर दिये.सूचना पाने के बाद मां की प्रतिक्रिया का अन्दाजा वह लगा सकती है.और उसे उसी पिटी पिटाई भंगिमा से नफ़रत होने लगी है.कई बार उसने फ़ैसला किया है कि अब वह घर की बात नहीं सोचेगी.दो चार वाक्य अपने में बुदबुदा कर,हर बार उसने यह भ्रम पाल लिया है कि उसने फ़ैसला कर लिया है.पर कुछ होता नहीं.कब तक अपने को झुठलाती रहे? बस एक हद होती है फ़िर अपने भ्रम को सहलाना भी अपमानजनक लगने लगता है.
" मां को मैं चौंकाना चाहती हूं." उनके पूछने पर उसने सफ़ाई पेश करना चाहा था.उसे अपनी ही विपन्नता पर खीझ हो आयी थी.
" हां हां वे जरूर चौंकेगीं," वे तब हंस दिये थे और उनकी हंसी का साथ देते हुये उसने भीतरी आशंका को चुप करा देना चाहा था.
रामी ने दोबारा दरवाजा खोल दिया था," पानी गरम कर दूं मेम साहब?"
वह चुपचाप उसे देखती रही.वह जैसे सहम गयी थी,और अपने वाक्यों को वापस लेने की हड़बड़ी में बोली,’ देर हो गयी थी ,सो पूछ लिया" और उसने सिर झुका लिया.मानो उसकी स्थिति के लिये खुद को जिम्मेदार ठहराना चाह रही हो.उसने सिर हिला दिया.
"अभी इच्छा नहीं है.मुझे डिस्टर्ब न करना.तुम लोग खा लेना. मैं तीन बजे तक नहाउंगी."
"अच्छा, मेम साहब!" वह चली गयी.उसका जी हुआ उसे रोक कर पूछे,रामी जैसे तुम औरों को बहु जी कहती हो मुझे नहीं कह सकती.?" पर उसने पूछा नहीं और चुपचाप उढके हुये दरवाजे पर आंख गड़ा दी.
पता नहीं कैसा अधूरपन छाता जा रहा है दिलो दिमाग पर? हर काम को वह झल्लाहट के साथ करने लगी है.उसे लगता है इस झल्लाहट ने उसके दांतो और नाखूनो को तीखा कर दिया है..और वह सभी को बात बात पर जख्मी कर देने पर तुल गयी है.सच तो यह है कि वह अकेले जीते जीते थक जाती है,दीवारों के साथ,पेंटिग्स के साथ और इन सारी सुख सुविधाओं के साथ.अब वे सारे ऐशो आराम जो कभी उसे एड्वेन्चर लगते थे,डराने लगे हैं और वह भाग कर दूर जाना चाहती है,पर कहां जाय ? यहां तो बाज़ार जाने,पास पड़ोसियों से मेल जोल रखने की भी मनाही है.
उसे अक्सर अपना अतीत याद आता है.वे इस पर रोक नहीं लगा पाय.उसे याद है अपना वह छोटा सा घर,भाई बहन के झगड़ों-उधमों से परेशान मां का झुर्रियोंदार चेहरा कमरे के कोने में पड़ी आराम कुर्सी पर लेट कर अखबार के प्रथम प्रिष्ठ्से ले कर आखिरी प्रिष्ठ तक चाट जाने वाले पिता जी!हालत यह कि आटे का कनस्तर अक्सर खाली पड़ा रहता.जिस दिन पिता जी वहां नहीं मिलते वह समझ जाती,आज या तो कनस्तर खाली है या फ़िर दाल नहीं है.मां की नाक इन दिनो विषेश चढी रहती.हलां कि उस पर तो वे यूं भी बरसती.सारी गरीबी के बावजूद उसके अपार सौन्दर्य और गठित देहयष्टि पर मां की आंख पड़ी नहीं कि उनके आशीर्वचन हांला कि बाद मे अकेली जब बाहर देहरी पर बैठती ,तब सांझ का दिया जला कर ,वह उनके समीप बैठ जाती-तो सह्सा उनकी आंखे नम हो जातीं और कहतीं,"मैं भी पापी हूं रे! कितना कुछ कह जाती हूं.पर सब तेरे भले के लिये ही तो!" और उसका हाथ दबा देती.
उसे याद है ,मां की संदेह द्रिष्टी स्कूल से लौटने तक उसका पीछा करती ही है.वह स्कूल में होती तब भी हर क्षणुन दो आंखों की चुभन मह्सूस करतीऔर अब लगता है,वह यही अनुभुति है,जिसकी वजह से वह अपने जिन्दा होने के एह्सास को नकारती रही है.
उस स्कूल के पूरे मौहाल में एक चेहरा याद आता है---अतुल का.
अतुल उसका पड़ोसी था,स्कूल का साथी.उसके आने से मां को एक बिन मांगा नौकर मिल गया.और उसे एक प्यारा साथी,जिसके आने के बाद उसे अपना जीवन अर्थपूर्ण लगने लगा था.कब वह घर का अतुल होता हुआ उसका अतुल हो गया ,वह जान ही नहीं पाई.मां को उसका आना-जाना अच्छा लगता था.एक काम काजी बेटा जो मिल गया था.दीपू और मंगू तो इतने छोटे थे कि उनका काम भी मां को ही करना पड़ता था.पापा को राजनीति  की गर्म चर्चा करने वाला एक साथी मिल गया था.उन्हें तो अतुल की एक दिन की भी गैरमौजुदगी अखरती.मतलब यह कि अतुल के आने जाने से घर भर को सुविधा थी.बस एतराज था तो उन सपनों से जो उन दोनो ने रौशनी में बुने थे.
" ही इज ए बास्टर्ड ." पापा चिल्लाये थे ,जिस दिन उसने अपना प्रस्ताव रखा था.
" न अपना कुल,न अपना गोत्र ! कहीं ऐसे में रिश्ते टिकते हैं ? फ़िर कमाना तक भी शुरु नहीं किया और मंजनू पहले बन गये!"पापा का गुस्सा काफ़ी देर तक उफ़नता रहा था..मां भी रसोई में उसे बिठा कर सुनाती रही.
किसी ने उससे पूछने की आवश्यकता नहीं समझी थी शायद!वे तो मानो मान बैठे थेकि बेटी उनकी  इज्जत सरे आम उतार फ़ेंक रही है.मां ने आंखो को छोटा कर के यह भी पूछा था," कहीं कुछ गलत सलत तो नहीं कर बैठी री लड़की?"उसने हर हिलाया था,पर बर्बस उसकी आंखों में आंसू आ गये थे.क्या सोचते हैं ये लोग? पहचान होने या प्यार होने का मतलब सिर्फ़ साथ लेटना ही तो नहीं होता.
पापा ने उसे पास बिठा कर दुलराते हुये कहा था," बेटी ,तुम्हारे भले के लिये जो कह रहा हूं उसे अन्यथा मत लेना.आज तुम्हें सब अनुचित भले ही लगे,कल जब तुम सोचोगी,सब सही ,सहज और आवश्यक लगेगा.मैंने तुम्हारा नाम प्यार से नहीं सार्थकता  के साथ अलकनन्दा रखा था..."आगे कुछ नहीं बोले थे वे.उनकी गोद में सर रख कर रोती रही थी वह.
अतुल चला गया था ,उससे विदा लिये बिना.उसकी बहन ने बताया था,उसका सेलेक्शन कानपुर आई.आई.टी .में  हो गया है और वह वहीं चला गया है.उस दिन वह घर लौट कर बिना खाये पिये ही सो गयी थी.किसी ने पूछा तक नहीं,फ़िर घर की अवस्था भी कुछ ऐसी थी कि एक वक्त का खाना बच जाना उनके लिये गैर मामूली बात नहीं थी.लड़की का भूखा सो जाना उन्हें सहज जरूर लगा था.अतुल का उससे बिना मिले चले जाना ,उसे असह्य हो उठा था.
कुल गोत्र को आड़े रख कर उसके और अतुल के सम्बन्धो की धज्जियां उड़ा दी गयीं.अब यहां कौन से रिश्ते कायम रह गये.?वहां कम से कम प्यार तो रौशनी में बुना गया था,यहां तो रिश्ते ही अंधेरे में जी रहे हैं.कुल गोत्र का पता तो दूर ,वह तो उनका पूरा नाम भी नहीं जानती.
’बस सुहाग ही तो नहीं रहेगा न?" उसे आश्चर्य हुआ था,यह वही मां बोल रही है,जो हर सोमवार कैलाश-मन्दिर में अपने सुहाग की रक्षा के लिये माथा टेकने जाती है.यह वही मां है जिसने अतुल को ले कर काण्ड खड़ा किया था? या ये वही पापा हैं जिन्होंने नाम की दुहाई दे कर उसकी अर्थवत्ता बनाये रखने का आग्रह किया था.पर हकीकत से बड़ा कुछ नहीं होता.यह वही मां थी.वही पापा.वे जब पारिवारिक मित्र त्रिपाठी जी के हाथ प्रस्ताव ले कर आये थे,तो मां और पापा किंकर्त्तव्यविमूढ हो गये थे.उसका पूरा विश्वास था ,पापा उसी तरह चिल्लायेगे," यू आर अ बासटार्ड." इतनी बड़ी बात कहने की हिम्मत कैसे हुई पर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब वे दोनों मौन रहे थे.एक दिन की मोहलत तो त्रिपाठी जी ने नाजुक स्थिति का अन्दाजा लगा कर दिला दी थी और वह ब्यूक गाड़ी उनके दरवाजे से धूल उड़ाती चली गयी थी.
कैसा प्रस्ताव था यह?न विवाह का ,न मन्त्रोच्चार का झंझट! वह शादी शुदा ,बाल बच्चेदार ,अति सम्पन्न व्यपारी थे,जिन्हें अपने भरे पूरे परिवार को कलकत्ते में छोड़ कर बम्बई में रहना पड़ता था.कलकत्ते का कारोबार उनके भाई संभालते.बम्बई में सारे दिन व्यस्त रहते पर सांझ घिरते ही उनका अकेलापन उन्हें शून्यता से भर देता.उन्हें एक केयर-टेकर चाहिये और वह भी लड़की,जो वहां उनके साथ रह सके.उनकी उस व्यस्तम जिन्दगी में से हासिल बचे क्षणों में साथ निभा सके- बिल्कुल पत्नी की तरह पर समाजिक तौर पर नहीं,निजी जिन्दगी में ,बंद दीवारों के बीच,सामाजिक भद्दे शब्दों में ’रखैल.
उसे इस प्रस्ताव पर आश्चर्य हुआ था,त्रिपाठी जी ने पापा को विश्वास दिलाया था की वे अलका को देख चुके हैं और कई दिनों से प्रस्ताव रखने में हिचकिचा रहे थे.यह तो त्रिपाठी जी ने उन्हें आश्वासन दिया है .काफी देखे ,भले सुने आदमी है .तकलीफ नहीं होगी.बिलकुल सुविधाओं से लाड देगे .बस,अलका राज करेगी .बम्बई में उसका परिचय किसे मालूम होगा ? आस पड़ोस वाले खुद ब खुद पति पत्नी समझाने लगेगे - कौन मांगता है शादी का सर्टिफिकेट. वे अपनी बात पापा तक पहुचाते पंहुचाते माँ की ओर देख लेते .
" अगर आपको एतराज हो तो यही घर में माला बदलवा लेते है ,ठाकुर जी के सामने !"
उन्होंने एक जोरदार तीर मारा था और वही तीर था जो निशाने पर लग गया .मां और पापा उस रात देर तक बाहर नीम तले बैठे रहे थे .वह उनकी बातें सुनने की आशा में तीन बार दरवाजे तक आयी,पर कुछ भी नहीं सुन पाई.
अगली सुबह मां ने उसे चाय देते हुये पूछा था," तुम्हारा क्या ख्याल है अलका?" कुछ क्षण मौन घहराया ही रहा.दोनों खामोश थे,अपने अपने अर्थों में.और उस खामोशी को वह किसी भी मूल्य पर तोड़ कर कोई भी कसैला घूट अपने भीतर नहीं उतारना चाहती थी.चुप रही वह.मां ने उसकी ओर देखा था,मानो वह दोबारा वह सवाल उठाते हुये डर रही हों.
" तुम लोगो ने क्या सोचा?" उसने सवाल को धुयें के छल्ले की तरह उनकी ओर लौटा दिया.मां चुप रही,मानो किसी तकलीफ़ को आंधी की तरह भीतर ही भीतर झेल रही हो.उनके चेहरे का तनाव क्षण भर में गायब हो गया. फ़िर पुचकारती सी बोली थी,"हम तो चाहते ही हैं,तुम सुखी और सम्पन्न रहो.तुम्हें एक भले घर में ब्याह दें - यह हमारा सपना था.हमारी इच्छा भी यही है.पर इच्छा से क्या होता है?"
उसे लगा था,वे झूठ बोल रहीं हैं.रहा होगा कभी वह सपना,पर बारी बारी से चार बच्चों के जन्म के बाद कहां खो गया वह,जो अब ढूढे नहीं मिल रहा.पापा केवल गली से गुजरती बारात को तमाशबीन की तरह देख सकते हैं बस! उसे आश्चर्य हुआ सोच कर कि आर्थिक विपन्नताओं में नैतिकता की सीमा को सुविधानुसार विस्तरित एंव संकुचित करने की अपार क्षमता होती है.उसका जी चाहा था,किसी अर्थशास्त्री और नैतिकशास्त्री से पूछे कि इनका मिलाजुला समाजशास्त्र कैसे बनेगा? उसने तो कभी सुविधाओं की शिकायत नहीं की थी ! फ़िर सत्रह वर्षों से वह इसकी आदी हो गयी है.सहसा मां को इसका ख्याल क्यों आया? नैतिकता का अनकहा बोध सिर्फ़ उसके भीतर ही बच रहा था.
अब जब वह घर गयी थी ,तो नये बदले घर की सुविधाओं को देख कर उसे विश्वास हो गया था कि सुविधा की जरूरत उसे नहीं ,घर वालों को थी.उसे याद है,पिछली बार पापा अपराधी की तरह सिर झुकाये बैथे रहे थे.उसका जी हुआ था ,वह कह दे कि जिस समपन्नता के लिये मुझे बच कर आज अपने को अपराधी महसूस कर रहे हैं,वह मुझे भी सुरक्षा नहीम दे पायी है.संपन्नता सुख सुविधाओं से नहीं ,खुद को गहराई से समझने और समझ कर उसे जीने से पनपती है.वह अकेले में बैठ कर जब भी सुख दुःख के गणित को परखना चाहती है,उसे हमेशा दुःख का पलड़ा ही भारी लगता रहा है.अपनी सारी सुख संपन्नता उसे एकदम अवैध लगने लगती है.उसे अक्सर लगता है,जैसे पूर्वाग्रहों की काली परछाई अक्सर उसके चेहरे पर छा जाती है.


वह घर गयी थी सिर्फ़ अपने स्म्रिति शेष अतीत को भरने ,भोगने और फ़िर से ताजा करने के लिये.पर उसे वहां जा कर मह्सूस हुआ,अतीत बस पोस्टर कलर की तरह है.एक जमाना था,जब,वे चटख थेव,सजीव थे,पर बहुत जल्द फ़ीके पड़ जाते हैं.रंग दोबारा घोला नहीं जाता,उसी सानुपातिक मिश्रण में .और उसे अपना जामा ऊपर से फ़ेर दिये गये ब्रश सा लगने लगा था.
मां ,मां न हो कर सुविधाओं की पूर्ति करने वाली नौकरानी हो कर रह गयी थी .उसकी हर सुविधा का ख्याल वह जब भी रखती उसे सबकी याद आ जाती.पुरानी मां की तो छाया तक शेष नहीं रह गयी थी.शायद उन्हें अपनी नयी अर्जित सुविधाओं में जीते जीते उसके प्रति क्रितग्यता का भाव व्यक्त करने के अलावा और कोई लगाव नहीं रह गया था.
वह कितना चाहती रही थी कि दीपू,मंगू और नन्हीं पंखे के लिये उससे झगड़े,मां उसे इस उस बात के लिये टोकें ,पर वह तो जैसे अजनबी हो गयी थी.वह बुरी तरह ऊब उठी थी.
इत्त्फ़ाक से उन्हीं दिनों त्रिपाठी जी की भतीजी का ब्याह था.पापा और मां दोनों नहीं गये थे.पापा कमरे की बत्ती बुझा कर लेट गये थे और मां ठाकुर जी के सामने बैठ कर रामचरित  मानस पढने लगी थी.उसके भीतर कई कई सवाल उफ़नने लगे थे,जो भीतर ही घुल गये.शब्दों की कड़ुआहट को होठों तक ला कर मुंह का जायका भक्भका करना उसे फ़ालतू लगा था.लगा था जैसे मां और पापा ने छोटे छोटे चौखटे बना लिये थे,जिनमें वे अपने चेहरे फ़िट नहीं कर पा रहे थे.इसी बोध ने उसे असहज बना दिया था.
वह समझ नहीं पा रही थी कि यह सब उसके सामने स्वांग रचा जा रहा है या फ़िर वे सचमुच अपने भीतर की सच्चाई के सामने घुटने टेक चुके हैं.कुछ भी हो उसे क्या फ़र्क पड़ता .वह गयी थी दो महीने के लिये ,दस दिन मे ही.फ़िर कभी नहीं गयी. लौट आयी थी.लौटते समय मां ने व्यवहारी तौर पर साड़ी और सिंदूर की डिबिया दी थी.उसे याद है लौट कर साड़ी तो उसने सहेज ली थी और सिंदूर की डिबिया रामी को दे दी थी.


बचपन में पश्चिम में फ़ैलती उस सिंदूरी आभा को देख हमेशा उसके मन में एक ख्याल पलता.वह भी मांग में खूब सिंदूर भर कर वहां खड़ी हो जाय. मानो होड़ लेना चाहती हो.उसने एक बार स्वेच्छा से थोड़ी मांग भर भी लाथी तो वह बोलेथे,’तुम मांग भर कर मत चला करो.लगता है,किसी पराई औरत को लिये जा रहा हूं."


घर जा कर उसने मांग रगड़ रगड़ कर पोंछ ली थी.मांग की जलन तो बुझ गयी,पर मन में एक दरार सी पड़ गयी थी,जो आज तक नहीं निकल पाई.
संस्कारों के प्रति अंधभक्ति कभी नहीं रही,पर बाज वक्त उनकी विरक्ति और इस तरह के वाक्यों को देख-सुन कर उसे लगता जैसे वह खुद उधार की चीज है,जिसे किसी को लौटाने को वह व्यग्र हैं.कहां छोड़ आते है अपना पौरुष? प्रेयसी के लिये कुछ कर गुजरने का आवेग कहां चला जाता है?
पिछले दो साल उनके साथ जीते जीते,वह उन्हें बहुत कुछ जानने लगी है. हालांकि उसके साथ उनका कम समय ही गुजर पाता है.अब वे बम्बई से बाहर भी जाने लगे हैं.दोनों के बीच के उम्र के फ़ासले को वह पचा जाती है पर जब वे खुशामदी तरीके से उसका शरीर सहलाते हैं तो उसे उनके पौरुष में पति या प्रेमी के बजाय पापा नज़र आने लगते हैं.उसे अक्सर मह्सूस होता .अगर वह उसके साथ सब जोर जबर्जस्ती करें तो उसे शायद नार्मल लगे.
शुरु शुरु में उसके प्रति उनके प्यार और स्नेह ने उसे इतनी अद्भुत स्फ़ूर्ति दी थी कि जीवन की सारी विसंगतियों को पूरे माद्दे के साथ जीने का अहम उसके भीतर घर कर गया था.उनके प्यार सम्मान को पा कर उसके भीतर का घाव कहीं भरने लगा था और वह स्वस्ति का अनुभव करने लगी थी.उसने एकाध बार मह्सूस भी किया कि इतनी मोहक स्थिति और उन्मुक्त भविष्य को चुनने में उसने इतना वक्त क्यों खराब किया.ऐसा कौन सा कोण था कि उसे इस सारे सुखों को स्वीकारने में भी हिचकिचाहट हो रही थी.वह घटना नहीं घटतीतो वह शायद आज बेहद आश्वस्त और सुरक्षित महसूस करती.
घटना बेहद छोटी थी.उन्होने ही एक पत्र के साथ अपने मित्र सक्सेना को भेजा था.वह आया.उसने उसे कमरे में ठहरा दिया थी.सारा प्रबन्ध उसने और रामी ने मिल कर किया था.उसे पहली बार लगा ,वह ग्रिहणी के सम्मान सहित अतिथि सत्कार कर रही है.
शाम ढलते ही रामी आयी थी," साहब आपको बुला रहे हैं."
" क्या कर रहे हैं ?"उसने उत्सुकता जाहिर की थी.
रामी ने हाथ के अंगूठे से होंठो को छुआ था.वह भारी मन से उठ गयी थी.आरम्भ की औपचारिकता के बाद वह सहजता पर उतर आया था.वह सहजता उसे भली नहीं लगी थी.और सहसा जब उसने कंधे पर हाथ रख उसे भींच लेना चाहा ,तो वह छिटक कर अलग हो गयी थी."रखैल को भी सतीत्व की चिंता है?" और उसका ठहाका गूंज गया था.
जब वह आये थे,तब उसने सारी बातें निहायत अंतरंग क्षणो में रुक रुक कर बताई थी.उसका ख्याल था ,सुनते ही वे भड़केगे.सक्सेना को मार डालने की धमकी देंगे,उसे पुचकार कर चूम लेंगे.पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.वे मौन सुनते रहे और वह उनके सीने से लग कर रोती रही.कुछ क्षण बाद एक एक शब्द मानो तौल-तौल कर उन्होंने कहा," यह तो बहुत बुरा हुआ." आगे की प्रतिक्रिया जानने के लिये वह उनकी ओर देखती रही थी.फ़िर वह उसे देखते हुये बोले थे" पिछली बार उसने जो कान्ट्रेक्ट साइन किये थे,पिछले हफ़्ते तोड़ दिये.हमारा नुकसान ढाई लाख का हुआ.मैं तब कारण नहीं समझ पाया था."
" अब समझ में आ गया न?" उसने तीखा हो जाना चाहा.वे मुस्कुरा दिये थे और उसे चिपका लिया था.वह चुपचाप उनके नाइट सूट के बटनों से खेलती रही थी.कुछ देर दोनों के बीच मैन पसर गया था.
" एक बात कहूं ,अलका?"
" हां ," उसने सर उनकी ओर घुमाया
" क्या होता अगर उसे चूम ही लेने देती ?"
वह छिटक कर उठ बैठी थी.वे जैसे स्थिति संभालने की कोशिश करते हुये बोले थे,’ मेरा मतलब है ,तुम इतनी माड पढी लिखी लड़की हो,अब भी उन फ़िजोल्ल के संस्कारों से बंधी हो ? शारीरिक पवित्रता जैसी नैतिकता क्या फ़ालतू नहीं लगती.?"
वह उन्हें घूर रही थी.सहसा उसने कह दिया,"अगर संस्कारों से इतनी ही बंधी होती तो मां बाप के बेच देने पर यहां चली नहीं आती."
’तो फ़िर क्या झगड़ा है?"वे हंस पड़े थे.
वह शांत्नहीं हो पाई थी.
"तुम सोचते होगे,सुख सुविधाओं के लिये तुम्हारे पास आयीं हूं,क्यों? नहीं," उसने जोर दे कर यकीन दिलाना चाहा था," यह सब तो तब भी कुछ अंशों में मिल ही जाता ,यदि मैं किसी और के साथ ब्याही जाती."’ब्याही’ शब्द पर जोर दे कर उसे संतोष मिला था.
रात कड़ुआहट में बदल रही थी.
"अच्छा ,अब दो दिनों के लिये आया हूं इसी तरह लड़ोगी?" उनका वाक्य था या चुम्बक?वह सारा आक्रोश भूल कर उनसे चिपक गयी थी.वह जो पूछना चाहती थी कि क्या वे अपनी पत्नी के साथ हुई किसी तत्सम घटना पर भी ऐसी ही प्रतिक्रिया व्यक्त करते,नहीं पूछ सकी.उसे लगा था ,वह पहली बार समझदार हो गयी है.सब कुछ कह देने के बजाय कभी कभी चुप रह जाना आपसी तनाव को ढीला कर जाता है.टकराने की तुलना में टाल जाना उसे बेहतर निर्णय लगा था और उसने निर्णय ले लिया था.उस रात की मिय़्हास सुबह तक नहीं भूल पायी.उनके बीच की मानसिक दूरी शारीरिक सामीप्य्के कारण पिघल गयी थी.और वही सामिप्य सच लगने लगा था,जिसे उसने कुछ दिनों पूर्व उम्र के फ़ासले के साथ जोड़ कर असहज और असंगत मान लिया था.
आज वे पहली बार उस घटना के बाद आ रहे हैं.उनको सुनाने के लिये उसके पास कुछ भी नहीं है सिवा अपने भीतर होने वाले शारीरिक परिवर्तन के.उन क्षणों को उनके साथ बांटना चाहती है पर कहीं से उसे एक अधूरापन घेर रहा है.वे इस घटना को सहज लेगें वह जानती है पर कहीं कुछ है जो उसे सहज नहीं होने दे रहा.उसे अपने ’मैं’ के साथ जीने की पूरी आज़ादी थे पर उस जिंदगी में वह खुद कहां रह पाई है.
उसकी आंखे दुखने लगी थीं उसने धीरे से करवट बदली.दरवाजा हल्की आवाज के साथ खुला और रामी भीतर 
थी.
"मेमसाहब,चार बज गये हैं .पानी तैयार है." उसके वाक्य ने उसे उठा दिया.
तैयार होते वह प्रसन्न होने का प्रयास करने लगी.सारी जिन्दगी उनकी अनुपस्थिति में एकरस हो कर ऊब का करण बन गयी थी और उसी ऊब की परिणिति थी यह उदासीनता.उनका यूं आ जाना एक सुखद व्यतिक्रम जरूर था पर दिनूं तक जीते चले आ रहे उस खोल से बाहर आने में भी तो समय लगता है न!
वह तैयार हो गयी थी,अन्तिम टच देते देते उसके हाथ रुक गये थे.दरवाजे पर वे दोनों बाहें फ़ैलाये मुस्कुराते हुये खड़े थे.वह मुड़ कर उनकी ओर लपकी.काफ़ी देर तक वे उसे चूमते रहे.वह भी बेहोश सी आलिंगनबद्ध राही.होश तब आया जब उनके हाथ रुके और उनकी हांफ़ती आवाज और बढे पेट से नफ़रत सी हो आयी.
चाय पीते सहसा वे बोले,"मराठा मन्दिर चलें?" वह खुश थी इस प्रस्ताव से.अरसे बाद बाहर जाने का अवसर मिला था.उनकी अनुपस्थिति में अकेले बाहर जाते उसे अपना आपा अरक्षित लगता.हांलाकि अब यह अनुभुति उनके साथ जीने के बावजूद जुड़ चुकी है.
शो शुरु हो चुका था.अंधेरे में अपनी सीट टटोलते दोनों बैठ गये.हड़बड़ी में उसका हाथ पास की सीट पर बैठे व्यक्ति से छू गया थाऔर उसने हाथ खींच लिया था.सारे समय वे अपने हाथ से उसकी कमर घेरे ही रहे.वह चुपचाप पर्दे की ओर आंखे गड़ाये बैठी रही .मध्यान्तर र्में वे उठे.वह साल ओढे बैठी रही.सहसा किसी के स्पर्श से चौंक गयी.
’अतुल!’वह चौंक उठी.एक हर्षमिश्रित आश्चर्य से उसकी आंखें फ़ैल गयीं."तुम"
उसके स्वर के आश्चर्य पर वह हंसता हुआ बोला."हां अलका,इधर टी. आई .एफ़. आर.में पिछले महीने ही एप्वाइंट्मेंट हुआ है.फ़िल्हाल लाज में हूं."
"तुम कैसी हो.बहुत दुबला गयी हो." उसने सारी बातें व्यग्रता से कह सुन लीं.वह अपने शब्द तलाश रही थी.उसके स्वर में वही स्नेह,वही आत्मीयता बरकरार है ,जिसने उसे पागल कर रखा था.उन दिनों कितनी बार उसका जी चाहा था कि इस आत्मीयता के सैलाब से अभिभूत हो कर वही घिसा पिटा पुराना वाक्य दोहरा दे जो सदियों से चला आ रहा है,पर कभी बूढा नहीं हुआ.’नायंभूत्वा.....’ उसे गीता याद आने लगी. पता नहीं क्यों अतुल के पास होते ही उसे अच्छी अच्छी बातें याद आने लगती हैं?वरना उनके पास जाते ही डबल बेड के सिवा कुछ नहीं सोच पाती.
वे कब आये पता ही नहीं चला.वह उनसे बेखबर उससे बातें पूछती रही थी.उसका अतीत लौट आया था.फ़िल्म शुरु हो गयी थी और अतुल उससे विदा ले कर अपनी सीट पर लौट गया था.जल्दी में उसका पता भी नहीं पूछ पायी थी.खैर फ़िल्म खत्म होते ही ,मिल कर पूछ लेगी.उसने अपने को आश्वस्त करते हुये सोचा.चुप थे वे.
" पहचान का था क्या?"उसकी ओर मुड़ कर उन्होंने सवाल किया.वह पर्दे की ओर देख रही थी .उसे समझने में देर लगी कि सवाल उससे किया गया है.वरना वह उसे भी फ़िल्म का एक डायलाग समझ बैठी थी.
"हां,हमारे ही शहर का है" अंधेरे में उसकी आंखें चमक गयीं.
वे चुप रहे.थोड़ी देर बाद उन्होंने धीरे से कहा," सिर में दर्द होने लगा है,चलें"
उनके इस अचानक सिर दर्द का कारण वह नहीं समझ पायी.पिक्चर खत्म होने के घंटे भर पहले वे उठ आये.सीढीयां उतरते वक्त उन्होंने उसके कंधे का सहारा लिया.वह चुचाप चलती रही.वे कार चलाते वक्त मौन थे.उनके मुंह में रखी सिगरेट को उसने आदतन जला दिया.
"यहां रहता है क्या?"वे कड़ी दोबारा जोड़ना चाहते थे शायद.पूछ क्यों नहीं लेते एक बार में सब कुछ? पर उसने थूक निगलते हुये कहा ,"हां"
चुप्पी फ़िर पसर गयी.रात वे चुचाप लेट गये.वह इस चुप्पी से आश्वस्त थी.उनके सवालों के पैनेपन को झेलने में अब स्वयं को अक्षम पाने लगी है वह.उसने उनका सूट्केस तैयार किया.कल ही सबेरे उन्हें हफ़्ते भर के लिये फ़िर जाना था.
वे छत की ओर एकटक देख रहे थे.और दिन होता तो वे इतनी देर बर्दाश्त नहीं कर पाते.
" बहुत अच्छा लगता है न वह?"
उनके स्वर में एक खास किस्म की उत्तेजना थी पर उसका यकीं था कि वे उत्तेजित होने वाली उम्र से कई मील के पत्थर आगे आ चुके हैं.उसका मन हुआ कि चीख कर पूछे कि ,’हां तो क्या कोई नियम है क्या कि मुझे आपके बिजनेस पार्टनर ही अच्छे लगें?" पर चीख नहीं सकी.वे जवाब पाने के लिये निरुद्विग्न से लगे.वह जानती है,यह कोशिश उनके तमाम उम्र के अनुभव की उपज है.पर उनकी परेशानी वह साफ़ अनुभव कर रही थी.वे मानो उस उम्र में लौट जाना चाहते हों,जहां अपने और प्रियजन के बीच में के किसी तीसरे के एह्सास मात्र से मन ढेरों काल्पनिक दुखों,घटनाक्रमों से बोझिल होने लगता है.और अपने विकल्प हो जाने के एहसास मात्र से तीखा हो जाता है.शायद वह उसी उम्र को उधार ले कर जीना चाहती है.उसे भीतर कहीं हल्की खुशी हुई. परिणाम चाहे जो हो ,पर उनके भीतर उफ़नते हुये उस एहसास से वह भीतर ही भीतर अभिभूत हो उठी.उनके चेहरे की झुर्रियां ,सफ़ेद चमकते बाल,बढती तोंद ,सब उसे नार्मल लगे.
वह मुस्कुरा दी.उसने उनके पास जा कर उनका चेहरा अपने हाथों में ले लिया.
"आपसे ज्यादा नहीं".यह वह बोल रही थी.वह हंस दिये-धीमे से किसी आश्वस्त बालक की तरह.उसके सामने वे थे,एक नये चुनौतीपूर्ण ढंग में.इसे झेलना उसे सुखद लगने लगा था.



                                 
 छायाचित्र---सुंदर अय्यर

Friday, September 16, 2011

कुछ पुस्तके सुमति जी के कलेक्शन में से...

१. १९७८ की श्रेष्ठ कहानियां--सम्पादक डा. महीप सिंह
२. राग परिचय,भाग३---हरिश्चद्र श्रीवास्तव
३ नीत्शे--जरथुष्ट्र ने कहा था---प्रस्तुति मुद्राराक्षस
४. पिता और पुत्र---इवान तुर्गेनेव
५. कविता नहीं है यह---अनिल जनविजय
६. प्रश्न और प्रश्न---[ललित निबन्ध]--जैनेन्द्र
७. बत्तीसवीं तारीख--हबीब कैफ़ी
८. तब भी यह देश चल रहा है---अजातशत्रु
९. आधुनिक हिन्दी भाषा और साहित्य--- प्रभाकर माचवे
१०. स्त्री उपेक्षिता--सीमोन द बौउवार
११. कविता का व्योम और व्योम की कविता--- मदन सोनी
१२. गीत गंगा---सं. गीता चौहान
१३. बयान--श्रीमती कमल कुमार
१४. आधुनिक भव बोध की संग्या---अम्रित राय
१५. निठल्ले की डायरी---हरिशंकर परसाई
१६. अधखिला गुलाब---ग्यान प्रकाश पाठक
१७. पूर्व वेला--इवान तुर्ग्नेव
१८. ग्राम सेवक---विश्वेश्वर
१९. अनायक---हबीब कैफ़ी
२०.भर्तहरि शत्कम---स्वामी जग्दीश्वरानन्द सरस्वती
२१. हिन्दी भाषा का इतिहास-- धीरेन्द्र वर्मा
२२. भाषा विग्यान-- डा. भोलानाथ तिवारी
२३. भारतीय नाट्य परम्परा-नेमिचन्द्र जैन
२४. आ नन्द तेरी हार है--वीरेन्द्र आस्तिक
२५. असली इन्सान--बोरीस पोलेवाई
२६. चाबी का गुड्डा-- उषा देवी विजय कोल्हट्कर
२७. भारतीय संस्क्रिति की पावन गंगा---डा.निजामुद्दीन
२८. बघेलखंड के लोकगीत---लखन प्रताप सिंह
२९. कुमार गंधर्व-- सं अशोक बाजपेयी
३०. भारतीय सौन्दर्य्शास्त्र की भूमिका-- डा.नगेन्द्र
३१. मेघदूतम---व्याख्याकार-- आचार्य श्री शेषराज शर्मा रेग्मी
३२. भार्तीय रंग्मंच--आद्य रंगाचार्य
३३. संगीत बोध-- डा> शरच्चन्द्र श्री धर परांजपे
३४. भारत भवन ,कलाओं का घर-- ध्रुव शुक्ला
३५. समय की शिला पर--- फ़णीश्वर नाथ रेणु
३६.भारतेन्दु समग्र
३७. सोबती एक सोहबत-- क्रिष्णा सोवती
३८. छायावाद की काव्य साधना-- प्रोफ़ेसर क्षेम
३९. आदिकाल की भूमिका-- पुरुषोत्तम प्रसाद असोपा
४०. साहित्य चिंता-- डा. देवराज
४१. तीसरी सत्ता---गिरिराज किशोर
४२. पालि साहित्य का इतिहास---डा. राज किशोर सिंह
४३. कुमार सम्भव-- व्याख्याकार प्रद्युमन पांडे
४४. आधुनिक साहित्य और कला---महेन्द्र भटनागर
४५. आचार्य शुक्ल सन्दर्भ और द्रिष्टि---डां जग्दीश नारायण ’पकंज’
४६. सूर संचयन-- डां मुंशीराम शर्मा
४७. मैथिली नाटक और रंगमंच-- डां प्रेमशंकर सिंह
४८. भारतीय संस्क्रिति-- बाबू गुलाब राय
४९. इस यात्रा में---लीलाधर जगूड़ी
५०. मछलीघर--- विजय देव नारायण साही


ये सारी पुस्तके कल ’अनुराग ट्रस्ट’ के पुस्तकालय को पहुंचा आये.सुमति जी को अच्छा लगेगा अपनी पुस्तकें सुधि पाठकों के हाथों में देख कर.